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मूड ही तो है

 

 

सुबह से उनका मूड ठिकाने पर नहीं था। जैसे-तैसे ऑफिस आ गए थे। बहुत सारा काम था, लेकिन वह हो ही नहीं रहा था। 
‘मूड को तो ठीक करना पड़ता है। हम उसमें बह नहीं सकते।’ यह मानना है डॉ. जिलियन मैकेन और डॉ. जिटे बेशगार्ड का। ये दोनों कनाडा में धर्म संस्कृति पर काम करती हैं। एक प्रोफेसर हैं और दूसरी साइकोथिरेपिस्ट। उनकी चर्चित किताब है, द सैक्रेड इन एक्जाइल: व्हाट इट मीन्स टु लूज योर रिलिजन। 
मूड अपनी जगह है। उसकी जगह है हमारी दुनिया में। हमें उसकी जरूर सुननी चाहिए। लेकिन अपने मूड से भी बड़ी होती है जिम्मेदारी। उस वक्त हमें मूड को समझाना ही होता है। उसे प्यार से बहला देना होता है। कुछ काम ऐसे होते हैं, जो हमें करने ही हैं। उन्हें हम रोक नहीं सकते। ऐसे में हमें अपने मूड का ठीकठाक इंतजाम करना पड़ता है। हम कुछ देर के लिए तो मूड में बह सकते हैं। इधर-उधर भटक सकते हैं। लेकिन एक सीमा तक ही। हमें काम करना है और उस काम का एक तय वक्त है। एक जिम्मेदारी है हम पर। और जब उस जिम्मेदारी का एहसास होता है, तो धीरे-धीरे सब बदलने लगता है। हम हल्का सा ब्रेक लेते हैं। चाय-कॉफी पी लेते हैं। थोड़ा सा घूम-फिर आते हैं। और काम पर लग जाते हैं। काम करते-करते हमारा मूड बेहतर होने लगता है। शुरू में कुछ ज्यादा ही ध्यान लगाना पड़ता है। कोशिश अच्छी-खासी करनी होती है। हमारा धैर्य भी जवाब देने लगता है। हमारा मन बार-बार भाग जाने को करता है। मगर हमें तो जुटे रहना होता है। एक जिम्मेदारी को निभाना है न। मूड को फिर देख लिया जाएगा।
 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 16 march