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वह न होने की पीड़ा

उन्हें देखते ही वह बेचैन हो जाते हैं। सालों पहले उन्होंने वैसा ही होना चाहा था। अपना सब कुछ झोंक दिया था उन्होंने, लेकिन...  
‘किसी की ओर मत देखो। अगर काम करने में मजा आ रहा है, तो हम बेहतर करेंगे ही।’ यह मानना है डॉ टोनी बर्नहार्ड का। वह मशहूर लेखिका हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया में कानून की प्रोफेसर थीं। एक भयंकर बीमारी की वजह से नौकरी छोड़ी और बीमार मन पर काम करने लगीं। उनकी चर्चित किताब है, हाउ टु वेक अप : अ बुद्धिस्ट इन्सपायर्ड गाइड टु नैविगेटिंग जॉय ऐंड सॉरो।’ 
हम अक्सर किसी न किसी से होड़ कर रहे होते हैं। काश! हम ऐसे हो जाते। हम वैसे हो जाते। कभी-कभी तो हम क्या चाहते हैं? यह भी कहीं पीछे छूट जाता है। किसी और जैसे होने के चक्कर में न हम उसके जैसे हो पाते हैं। और न ही अपने में रह पाते हैं। एक अजीब किस्म की छटपटाहट में हम जीते हैं। उसका सबसे ज्यादा असर हमारे काम पर ही पड़ता है। हम जब अपने से अलग कुछ होना चाहते हैं, तो खुद को आधा कर देते हैं। अब आधे-अधूरे हम कितना सफर तय कर सकते हैं? और फिर अपने को आधा-अधूरा कर खुश भी कैसे रह सकते हैं? हम दूसरे जैसे हों या न हों, लेकिन अपनी खुशी का उड़ जाना तो तय है। हमें सबसे पहले यह देखना होता है कि काम करते हुए हम खुश हैं या नहीं। हमारे बेहतर काम करने का उससे करीबी रिश्ता होता है। हम काम करते हुए खुश होते हैं, तो बेहतर करते हैं। कुछ नया करने की पहल करते हैं। हमारे लिए यही मायने रखता है।
 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 16 june