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कभी-कभी निर्मम होना

आदमी की यह आंतरिक इच्छा होती है कि वह सबका प्रिय हो, हर कोई उसे मान-सम्मान, प्यार-दुलार दे। कोई उसकी कमी नहीं बताए, जो आए उसे मनसा वाचा कर्मणा तृप्त करे। सभी उससे इज्जत से पेश आएं। नाराज होने का हक सिर्फ उसे हासिल हो। वह जो भी कहे, लोग उसे ब्रह्म वाक्य समझें। ऐसी नामालूम कितनी कामनाएं आदमी के मन में पलती रहती हैं, लेकिन दुनिया सिर्फ उसके इशारे पर नहीं चलती।
संसार में हमें जीना है, तो हमें उसके कायदे-कानूनों का चाहे-अनचाहे पालन और सम्मान करना होगा। जन्म से लेकर मृत्यु तक ऐसे कई मोड़ आते हैं, जब हमें छोड़ते जाने का निर्णय करते जाना पड़ता है। जिंदगी वेग से बहती हुई नदी की तरह सिर्फ आगे चलना चाहती है। न वह रुक सकती है, न पीछे लौट सकती है। परिणाम पहले से जानने के बाद भी हमें जीवन के कई कठोर निर्णय लेने पड़ते हैं। सारा जीवन एक तरह से सहने का अभ्यास ही तो है। किसी का ब्याह होता है, तो खुशी में बाजे बजते हैं, पर ताउम्र जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। शायद दुनिया में सबसे ज्यादा व्यंग्य पति-पत्नी को लेकर ही कहे गए हैं। रहीम का दोहा है- रहिमन ब्याह बियाधि है, सकहु तो जाहु बचाय/ पायन बेड़ी पड़त है, ढोल बजाय-बजाय।  पीछे छूट जाने वाला समय वापस नहीं आता। पुत्र चिता पर कपाल क्रिया करते समय हल्की चोट करता है, तो वह ममता से मुक्त होने का ही प्रयास है। जीवन में ममत्व भी जरूरी है और निर्ममता भी। बच्चन लिखते हैं- निर्ममता भी है जीवन में/ हो वासंती अनिल प्रवाहित/ करता जिनको दिन-दिन विकसित/ उन्हीं दलों को शिशिर-समीरण तोड़ गिराता है दो क्षण में।
    

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 16 april