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भीतर का दुश्मन

एक शेर है- हर कदम पर नाकामी, हर कदम पर महरूमी, गालिबन कोई दुश्मन दोस्तों में शामिल है।  अगर आप परेशान हैं, तो कोई न कोई दुश्मन आपके खिलाफ सक्रिय है। दुश्मन तो हर किसी के होते हैं, कम या ज्यादा। पर आपने कभी सोचा है कि जिंदगी भर हम किस दुश्मन से सबसे ज्यादा परेशान रहते हैं? यकीनन अपने भीतर बैठे दुश्मन से, जो हमारा ही एक हिस्सा होता है। जब आदमी खुद का दुश्मन होता है, तब उसे पता ही नहीं चलता, फिर इसे स्वीकारना भी काफी कठिन होता है। रूसी लेखक और पेंटर मिखेल लेरमंतव, जिन्हें पोएट ऑफ कॉकेशस भी कहा जाता है, कहते थे- मैं जब भी कुछ बेहतरीन सोचता हूं, मेरे भीतर ठीक उसी समय कोई उसे बदतरीन बताने में जुट जाता है। उसकी कोशिश होती है कि मैं अपनी कलम या कूची न उठाऊं। उठाऊं भी, तो वही करता रहूं, जो आज तक किया जाता रहा है, नया नहीं, क्योंकि इसमें चुनौतियां हैं, बाधाएं हैं। अब यह आप पर है कि आप किसकी बात मानते हैं? 
दिक्कत है कि आप जब तक सोच-विचार की हालत में हैं, यह दुश्मन जिंदा रहता है। इसे आप बाहर नहीं कर सकते। जरूरत है इसे साधने की। जमशेदजी टाटा जब टाटानगर में अपनी कंपनी की स्थापना कर रहे थे, तब कई बार हां-ना की स्थिति में पहुंचे। दुश्मन न बोल रहा था। उन्होंने बताया कि मैंने यह विश्वास करने की आदत डाल ली कि मेरे साथ जो होना है, वह सर्वश्रेष्ठ ही होना है। इसके बाद दुश्मन चुप हो गया होगा। आध्यात्मिक मार्ग पर इस दुश्मन को परास्त करने का एक रास्ता बताया गया है- संतुलन में रहें, संयमित रहें, फिर आप जो करेंगे, वह अच्छा ही होगा।

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 15 march