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3 अप्रैल, 2020|3:41|IST

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दूरदर्शी बनना

आंख के एक प्रसिद्ध डॉक्टर के पास पहुंचे मेरे मित्र ने कहा कि मेरी आंखों का इलाज कीजिए, मुझे दूर तक तो साफ-साफ दिखता है, पर नजदीक की चीजें दिखाई नहीं देतीं। मुझे कागज के छपे अक्षर टेढ़ी-मेढ़ी रेखाओं की तरह नजर आते हैं। मित्र को तो आंखों का रोग था, मगर हमारा पूरा समाज वर्तमान को भुलाकर भविष्य संवारने में लगा है। समीप को देखना वर्तमान है, दूर को देखना भविष्य है। ऐसे भी, दूरी हमेशा से आकर्षण का विषय रही है। सूरज, चांद, सितारे हमसे बहुत दूर हैं, इसलिए ज्यादा रिझाते हैं। परमात्मा हमारी पकड़ से दूर है, इसलिए प्रिय है। बहरहाल, आज का आदमी कल की चिंता में बेचैन है। हम इस चमकदार कल के लिए सुख के सारे साधन इकट्ठा करने में लगे हैं। इस वृत्ति ने हमारे भीतर के त्याग और अपरिग्रह को हमसे छीन लिया है। कहते हैं कि रामायण में जटायु के भाई संपाती ने अपनी दूरदृष्टि से लंका की अशोक वाटिका में सीता के होने का पता लगा लिया था। 
मनुष्य अपने भरे-पूरे जीवन में मृत्यु की कल्पना से भयभीत हो जाता है। उसमें राग या ‘इरोस’ के बदले द्वेष और विरोध में, जिसे मनोवैज्ञानिक ‘थेनॉटॉस’ कहते हैं, अधिक आकर्षण दिखलाई देता है। टेढे़ लोग, उल्टी-सीधी घटनाएं उसे पसंद आने लगती हैं। यहां तक कि खाद्य पदार्थ के बारे में ‘टेढ़ा है, पर मेरा है’ जैसे प्रयोग चल निकलते हैं। शायद इसीलिए प्राचीन भारतीय आचार्यों ने वक्रता और वैषम्य को कविता में महत्व प्रदान किया। भविष्य बांचने की यही इच्छा उसे ज्योतिषियों  तक पहुंचा देती है, इसीलिए नजरों की सीमा को भी दूरदर्शन ही समझिए।

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 14 january