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विफलता बनाम जीवन

इस दुनिया में परीक्षा से सबको डर लगता है। यह सर्वाधिक कुदरती और मानवीय घटना है, क्योंकि परीक्षा में पूछे गए प्रश्न हमारी इच्छा के अनुरूप नहीं होते। यही कारण है कि भय और तनाव के माहौल का सृजन होता है। किंतु इससे भी अधिक बदतर स्थिति तब होती है, जब कोई छात्र परीक्षा में असफल हो जाता है। उसके लिए, जैसे सपनों की पूरी दुनिया ही बिखर जाती है। कई बार तो वह हताशा का इस कदर शिकार हो जाता है कि उसे अपनी जिंदगी बेमानी लगने लगती है। प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में जीवन में परीक्षा के परिणाम इतने अहम होते हैं कि विफलता की स्थिति में इंसान के जीने का कोई अवलंब नहीं बचा रह जाता? क्या परीक्षा और इसके परिणामों की संजीदगी जीवन-मृत्यु सरीखा ही अहम और युगांतकारी होती है?
असफलता की स्थिति में सबसे पहले हमें यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि हमसे गलतियां कहां हुई हैं? जब यह पता लग जाए कि हमसे चूक कहां हुई है, तो हमें उन कमजोरियों को दूर करने के लिए जी-जान से प्रयास करना चाहिए। कहते हैं कि स्वाध्याय से मानव पूर्णता के रास्ते देवता बन सकता है। स्वाध्याय का अर्थ है- नित्य सीखते रहना और अपनी कमियों को निरंतर दूर करते रहना। लिहाजा असफलता की स्थिति में मन को व्यथित करने की बजाय उसे फिर से व्यवस्थित करने की कोशिश करनी चाहिए, फिर आपको कोई हरा नहीं सकता। सबसे पहले इस सत्य को आत्मसात करने के लिए मन का अनुकूल बनाने की जरूरत है कि परीक्षाएं चाहे कितनी ही बड़ी क्यों न हों, वे जीवन से बड़ी 
नहीं हो सकतीं।

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  • Web Title:mansa-vacha-karmana-article-of-hindustan-on-13-March