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घाटा को जमा में बदलना

महान मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड एडलर ने लोगों के भीतर शक्ति के स्रोतों के अध्ययन में जीवन लगाया, तो पाया कि मनुष्य की चमत्कारी विशेषताओं में से एक है- घाटा को जमा में बदल देना। इसी भाव को जूलियस रोसेन वॉल्ड ने इस प्रकार व्यक्त किया कि ‘जब आप के हिस्से में नींबू आए, तो उसका शरबत बना लें।’

दूसरी ओर नासमझ इसके ठीक विपरीत हथियार डाल देता है। वह पराजित भाव से कहता है, ‘मेरा दुर्भाग्य है।’ ‘मुझे अवसर ही नहीं मिला।’ वह आत्म-ग्लानि में डूब जाता है। कोई बुद्धिमान ऐसी परिस्थिति में घिरता है, तो वह सोचने लगता है कि मैं इस हानि को लाभ में कैसे बदल सकता हूं? फ्लोरिडा में एक किसान ने खेत खरीदा। बाद में पता चला कि उस जमीन पर न तो फलदार पेड़ लग सकते थे, न ही सुअरों को पाला जा सकता था। बस वहां झाड़-झंखाड़ ही पनप सकते थे। उसने सोचा, क्यों न इस मुसीबत को उपयोगी वस्तु में बदला जाए? यहां निकलने वाले सांपों को ही उपलब्धि बनाई जाए? सब लोगों ने देखा कि उसने सांपों को डिब्बों में बंद करना शुरू कर किया। इन सांपों को देखने के लिए पर्यटक आने लगे। समय के साथ उनकी संख्या 20,000 प्रति वर्ष हो गई। उन सांपों का विष निकालकर प्रयोगशालाओं में भेजा जाने लगा। उससे सांप के काटे के इलाज के लिए औषधि बनने लगी। सांपों की चमड़ी मन चाहे मूल्य पर बिकनी शुरू हो गई। ्त्रिरयों के पर्स, जूते, डिब्बाबंद सांपों का मांस दुनिया भर के ग्राहकों को भेजा जाता। उस गांव का नामकरण ही ‘रैटल स्नेक फ्लोरिडा’ हो गया। यह उस व्यक्ति का सम्मान था, जो हारा नहीं। उसने हानि को लाभ में बदल डाला।

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  • Web Title:mansa vacha karmana article of hindustan on 12 september