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संताप बन जाए तप

संसार में मनुष्य दुख की पूंजी लेकर जीवन के व्यवसाय में उतरता है। ढूंढ़ने पर भी ऐसा व्यक्ति मिलना मुश्किल है, जो जीवन में कभी रोया न हो, कभी हारा न हो या कभी विचलित न हुआ हो। चिंतकों ने दुखों की अनेक कोटियां गिनाई हैं। दुख का संताप या ताप ही अश्रु बनकर छलकता है। अधिकांश दुख हमारे स्वयं के गढे़ हुए होते हैं। हम अपनी करनी और अपने निर्णय से दुखों को आने का आमंत्रण दे देते हैं। काठ का टुकड़ा देखने में सूखा प्रतीत होता है, लेकिन उसके भीतर धधकती हुई आग छिपी बैठी होती है। मनुष्य के मन में इच्छाओं के सर्प फण फैलाए हैं, जो अपने विष से हमें पीड़ित करते रहते हैं। हमें संतप्त करने में दूसरों का भी हाथ होता है। दुनिया की धक्का-मुक्की में किसी को गिरा देना कठिन नहीं होता। दूसरों के कारण भी पीड़ित होने के लिए बाध्य होना पड़ता है। हमारे कुछ दुख कल्पित भी हैं, जो भय की आशंका से पैदा होते हैं। संस्कृत की एक उक्ति का अर्थ है- दुख जब तक आ नहीं जाता, तभी तक वह भयकारी होता है। 
वैदिक काल में यज्ञों की प्रधानता थी। तप के लिए पंचाग्नि में शरीर को तपाने का विधान था। इसलिए जब हमें संसार की पीड़ाएं उत्तप्त करने लगें, तो हम जंगल में फैले हुए दावानल के बीच किसी हरे-भरे फलदार वृक्ष की तरह शांत और स्थिर भाव से बाहर की आग के बुझने की प्रतीक्षा करें, तभी इस जीवन की वेदना तप बन सकती है।  
जनार्दन झा ‘द्विज’ ने लिखा है- बड़ी जलन है इस ज्वाला में/ जलना कोई खेल नहीं है/  इधर देखता हूं करुणा से मानवता का मेल नहीं है।  संसार की अग्नि के बीच भी मानवीय करुणा का स्रोत सूखना नहीं चाहिए।
 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 12 june