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ये इश्क नहीं आसां

 

 

जैसे ही प्रेम की बात उठती है, संतों से लेकर आम लोगों तक में एक ही आह उठती है कि यह बहुत मुश्किल मामला है। यह तो एक आग का दरिया है, जिसमें डूबकर जाना है। कबीर कहते हैं, प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय, राजा परजा जैही रुचे, सीस देई ले जाय।  रहीम भी यही समझाते हैं कि प्रेम पंथ ऐसो कठिन, सब कोउ निबहत नांहि।  फिर, कितने ही बडे़ पंडित हों, जब तक प्रेम का ढाई आखर नहीं पढ़ते, तब तक पंडित नहीं कहलाते। लेकिन मुसीबत यह है कि यह ढाई आखर पढ़ते ही सब पंडिताई बह जाती है। प्रेम को पढ़ने का अर्थ है, प्रेम को जीना। और प्रेम को जीने का अर्थ है, जलकर राख हो जाना।
आश्चर्य, मनुष्य की सबसे मूलभूत जरूरत इतनी कठिन क्यों हो गई? कठिन इसलिए कि इसमें अहंकार को मिटाना पड़ता है। आप इस जगत में कुछ भी सीखें, आपका अहंकार मजबूत होता है। आपकी हर शिक्षा अहंकार का आभूषण बनती है, लेकिन प्रेम का पाठ बिल्कुल उल्टा है। इसमें अहंकार को पिघलाना पड़ता है, दूसरे के साथ घुल-मिल जाना पड़ता है, नहीं तो प्रेम का अनुभव हो ही नहीं सकता। फिलहाल पूरी दुनिया बुद्धि के रास्ते चल रही है, जबकि प्रेम के लिए हृदय की राह पकड़नी पड़ती है। यहां कोई बना-बनाया रास्ता नहीं है। फिर समाज की सम्मति मिलेगी, इसकी गारंटी भी नहीं। सच तो यह है कि प्रेम की सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं है। उल्टे समाज प्रेम के खिलाफ होता है, क्योंकि प्रेम व्यक्ति को विद्रोही बनाता है। इसीलिए इसे दबाया गया है, ताकि लोग अपनी ताकत का इस्तेमाल न करें। बस, साल में एक दिन प्रेम का उत्सव मनाएं और फिर उसे भूल जाएं।
    

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 12 february