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अरे, यायावर रहेगा याद 

यह दुनिया हमें इसलिए खूबसूरत लगती है कि यह रोज नई हो रही है। हर वस्तु दूसरे सांचे में ढल रही है। जड़ वस्तुएं भी समय के दबाव से अपना चोला बदलती रहती हैं। बहती नदी भी दूर-दूर तक चलती हुई यात्रा करती है। कितने पड़ाव, कितने घाट, कितने मोड़, गांव और नगरों को पार कर वह समुद्र से जा मिलती है।ट

ध्यान से देखें, तो हम सब यात्री हैं। घूमना हमारा स्वभाव है, चलना हमारी नियति है। हमारे देखने के लिए अनेक पर्यटन-स्थल हैं, पर नदी, पहाड़, समुद्र या फूलों के बगीचों से पहले हमें कुछ और भी देखने की जरूरत है। हमें आपादमस्तक अपने शरीर की भी बात सुननी है, एक-एक रोम का ख्याल रखना है। फिर मन की बारी आती है। मन के बेलगाम घोड़े को काबू में करना है। भगवान बुद्ध ने कहा था- जो ज्ञानी होते हैं, वे केवल घर में आनंद नहीं मनाते। उनको घूमने में ही आनंद आता है- न निकेते रमन्ति ते।  पर्यावरण और पर्यटन- ये दोनों गहरे जुड़े हैं। इसी को गौतम बुद्ध ने ‘मैत्री विहार’ भी कहा। जब सभी समान भूमिका में आते हैं, तो मैत्री निभती है। मैत्री शब्द का पहला प्रयोग वेद में मिलता है। यजुर्वेद  में कहा गया है- सबको मित्र की दृष्टि से देखो। गीता  में भी मैत्र: करुण एव च  कहकर मैत्री और करुणा को जोड़ दिया गया है। हम घुमक्कड़ हैं, हमें अपनी धुरी पर जीवन की परिक्रमा करनी है। राहुल सांकृत्यायन का एक मशहूर लेख है- अथातो घुमक्कड़ जिज्ञासा। अज्ञेय कहते हैं- मैंने आंख भर देखा/ दिया मन को दिलासा/ पुन: आऊंगा/ भले ही बरस, दिन अनगिनत युगों के बाद/ क्षितिज ने पलक-सी खोली/ तमक कर दामिनी बोली/ अरे, यायावर रहेगा याद।
  

 

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  • Web Title:mansa vacha karmana article of hindustan on 11 september