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रंग और वसंत

हवा और धूप में उड़ती हुई खबर फैली है कि वसंत अपने सखा-संगियों के साथ पहुंच गया है। कवि कालिदास ने वसंत को कामदेव का पक्का मित्र घोषित किया था। सब ओर आम के पेड़ों ने मंजरों के बाण तान दिए हैं। मतवाला बना देने वाली सुगंध धरती के रोम-रोम से उठ रही है। फूलों के बाग खिलने को मचल उठे हैं।
पुराने जमाने में हर राजमहल की अपनी पुष्प वाटिकाएं होती थीं। रामचरितमानस का पुष्पवाटिका वर्णन राम और सीता के प्रथम मिलन और आकर्षण का साक्षी बनता है। पुराने महाकाव्यों और नाटकों में बाग के साथ तड़ाग या कमलों से आच्छादित सरोवरों का जिक्र मिलता है। अभिज्ञान शाकुंतलम् में नाल सहित कमल के साथ शकुंतला क्रीड़ा करती दिखाई देती है- ‘हस्ते लीला कमल मलके’। कहा जाता है कि सूर्य के सात घोड़े सात रंगों के प्रतीक हैं। रंग हमारी मनोदशा को व्यक्त करते हैैं। लाल-पीले और नीले-हरे जैसे रंगों के साथ काले रंग का भी अनोखा जादू है। अग्नि का स्पर्श होते ही जलने वाली वस्तु काली पड़ जाती है। होलिका-पर्व में हम काई-कीच को सिर चढ़ाकर आदर दे देते हैं। वहां कोई भी भेद-भाव नहीं होता। इसी समानता का नाम है वसंत। अनेक रंगों और वर्णों के ये फूल मानो भारत की जनता की विविधता को उसके अलग-अलग रंगों व खुशबुओं को व्यक्त करते हैं। उस समय भारत विराट वृक्ष की तरह दिखाई देता है, कितनी डालियां, कितने पत्ते, कितने फूलों और फलों से लदा एक सांस्कृतिक धरोहर जैसा लगता है, जिसमें रंग भी है, सुगंध भी है और स्वाद भी- इसी पूर्ण परितृप्ति का नाम भारतवर्ष है। वसंत का अनुभव मानो भारत का अनुभव है।

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 11 february