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सफलता के बाद

हाल ही में पेरिस के एक ख्यातिनाम फैशन डिजाइनर कार्ल लैगरफील्ड की मृत्यु हुई। वह बहुत आलीशान जीवन जीते थे और बिल्कुल अकेले रहते थे। उन्होंने अपना एक अलग ही ब्रांड शुरू किया था। उनसे एक टीवी साक्षात्कार में पूछा गया, ‘आपके बाद आपका वारिस कौन होगा?’ उन्होंने कहा, ‘मैं नहीं रहूंगा, फिर मैं क्यों फिक्र करूं?’ यह जवाब सुनकर चीन विचारक लाओत्से की याद आई, कर्म सफल होने के बाद जब कर्ता का यश फैलने लगे, तब उसका स्वयं को ओझल कर लेना ही सुखद है।
यह उल्टा मालूम होता है, क्योंकि यश मिलने के बाद उसे भोगने का प्रबल मन होता है। लगता है, हजारों लोग इसे देखें, मुझे सराहें। लंबे समय तक हम उसका जायका लें। पर मन की गति और जिंदगी की गति बिल्कुल अलग है। शिखर पर पहुंचने का एक ही क्षण होता है, उसके बाद जिंदगी वहां रुकती थोड़े ही है। आप वह क्षण कैमरे में कैद करना चाहते हैं, आजकल कर भी लेते हैं, पर जीवंत क्षण को बांध नहीं सकते। वह तो गया। उसके साथ ही आपकी पकड़ भी चली जाती है। ओशो कहते हैं, विजय के क्षण में जो हट सकता है, उसका अहंकार तत्क्षण तिरोहित हो जाता है। पराजय के क्षण में जो टिक सकता है, उसका भी अहंकार तिरोहित हो जाता है। इसके विपरीत दो स्थितियां हैं। पराजय के क्षण में छिप जाओ और विजय के क्षण में प्रकट हो जाओ, तो अहंकार मजबूत होता है। अहंकार के कारण ही हम छिपना चाहते हैं और अहंकार के कारण ही हम प्रकट होना चाहते हैं। ये दोनों ही अहंकार के खेल हैं। इनसे हट जाएं, तभी हम संतुलित और शांत मनोदशा पा सकते हैं। 
 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 10 june