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पानी से दोस्ती

ढेर सारे आंकड़े हैं, जो यह बताते हैं कि देश की आबादी के एक बहुत बड़े हिस्से को पीने का पानी सहजता से नहीं मिल पा रहा। पानी न होने का रोना रोते हुए हम जिस प्रकृति की ओर आशा भरी निगाहों से टकटकी लगा देते हैं, उससे दोस्ती करने की फुरसत नहीं निकाल पाते। अब हम उस स्थिति में आ गए हैं, जब पानी से दोस्ती की सार्थक कोशिश करनी होगी। 
आने वाले बरसात के दिन पानी से दोस्ती को ताजा करने के दिन हैं। थोड़ी बारिश हो या ज्यादा, पानी को बचाने और उसे संरक्षित करने के उपायों पर पूरा जोर लगा देने की जुगत भिड़ानी होगी। अब चाहे परंपरागत पोखर भरने की जुगत हो या नई वाटर हार्वेस्टिंग की जुगत। वैसे यह काम हो तो रहा है, लेकिन केवल शहरों में और मजबूरी में। ऐसी ही पहल उन कुओं के लिए करनी होगी, जिन्हें हमने लगभग भुला सा दिया है। शहरों के पुराने इलाकों में तो इन कुओं का अस्तित्व ही समाप्त कर दिया गया है, लेकिन गांवों में अब भी अंतिम सांस लेते हुए ही सही, ये कुएं मौजूद हैं। 
तकनीक के बलबूते बदलते समय और बदलते समाज में पानी से दोस्ती की कवायद को मूर्त रूप देने के लिए हमें जहां एक ओर पानी सहेजने की परंपरागत रीतियों की याद लोगों को करानी है, तो वहीं पुरानी पड़ चुकी इन रीतियों को नई जरूरतों के हिसाब से नया करने की जुगत भी भिड़ानी होगी। बार-बार बताना होगा कि पानी की दो बूंद हथेली में लेकर जीवन तार देने का संकल्प, अब उन्हीं दो बूंद पानी को बचाने के संकल्प में बदल चुका है। अगर एक बार जुगत लग गई, तो समझिए कि पानी से दोस्ती के दिन वापस आ ही जाएंगे।

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 10 july