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धन बरसे

धन को लेकर हममें से ज्यादातर लोग विरोधाभासी रहे हैं। हमें यह आकर्षित करता है, पर कहीं न कहीं इससे एक दूरी बनाकर रखने की सोच हममें होती है। अपने लिए धन कमाना जितना स्वीकार्य भाव लिए होता है, उतना ही दूसरों का धन कमाना अखरता है। सोशल साइकोलॉजिस्ट रोल्फ हाउबल का कहना है कि जिन समाजों में धन महत्व रखता है, वहां यह रिश्तों को खामोशी से रूप देने का माध्यम बन जाता है। वे पैसे की क्षमता को सबसे अहम सांस्कृतिक तकनीक में से एक मानते हैं और कहते हैं, हमें बचपन में न सिर्फ यह सीखना चाहिए कि धन का क्या करें, बल्कि यह भी कि धन हमारे साथ क्या करता है? हमें कैसे ऊपर उठाता है और कैसे रसातल में ले जाता है?
धन कमाने को लेकर हमेशा सकारात्मक रहने की जरूरत है। अगर आप धन कमाने में नहीं लगे हैं, तो खुद को मूलभूत हक से वंचित कर रहे हैं। जिन सभ्यताओं में धन को बुराई के तौर पर देखा गया, वे ही आज ज्यादा गरीब और पिछड़ी हैं। आर्थिक युग होने के बावजूद आज दुनिया में बहुतेरे लोग ऐसे हैं, जो अमीरों के प्रति कटु हैं। यह उनकी वित्तीय बीमारी का लक्षण है। धन भी मानवीय प्रवृत्ति रखता है। वह ऐसे आदमी के यहां कभी नहीं रुकता, जहां उसकी निंदा हो। दिक्कत यह है कि हम धन को या तो सब कुछ समझ बैठते हैं या फिर हाथों का मैल। दोनों स्थितियां अव्यावहारिक हैं। संतुलित जीवन में धन हासिल करना भी महत्वपूर्ण जरूरत है। धन अगर आपा खो देने का काम करे, तो इसमें कोई 
गुण नहीं। यह प्रवाहमान न रहे, तो जीवन से दुर्गंध 
उठने लगती है।
 

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  • Web Title:Mansa vacha karmana article of hindustan on 10 january