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फुटकल खाते में

हमारी आवश्यकताएं तो अनंत हैं, हमारे मन की तरह वे बेलगाम और निरंकुश हैं। कभी-कभी वे इच्छाएं हम पर इतनी हावी हो जाती हैं कि काममय एवायं पुरुष  कहकर इच्छा को ही मनुष्य का दर्जा दे दिया जाता है। आज समय बदल गया है। एक ही चीज के इतने ब्रांड उपलब्ध हैं कि अक्ल चकरा जाती है। इन्हीं से कई कृत्रिम आवश्यकताएं भी पैदा हो जाती हैं। हमारे संत-महात्माओं और शास्त्रों ने हमें संचय न करने- अपरिग्रही होने का संदेश दिया था। पर हम आज धन तो जमा करते हैं, किंतु मन हमारे हाथ से खिसक जाता है। हम रेत को मुट्ठी में दबाकर गर्व का अनुभव करते हैं। 

आज का आदमी इतना चतुर है कि वह पुराने संस्कारों और चली आती हुई परंपराओं को साफ-साफ नकारता भी नहीं हैसाफ छुपते भी नहीं सामने आते भी नहीं  की दशा है। हमने बुजुगार्ें की सीख और उनके किस्सों को बड़े आराम से फुटकल खाते में डाल रखा है। ऐसे कि वे जरूरी भी हैं और गैर-जरूरी भी। हमारे देसी और विदेशी लोग भी विवाह के संस्कार तो वैदिक रीति से करना चाहते हैं, पर आगे जीवन में हाशिये पर जाकर वे संस्कार महत्वहीन हो जाते हैं। इसी तरह, हम मनुष्य की महिमा के गीत तो गाते हैं, पर उसका दुख सही तौर पर समझ नहीं पाते। आज हमें सिर्फ सामाजिक भेद-भाव को मिटाने की क्रांति ही नहीं करनी है, बल्कि वैचारिक क्रांति की भी हमको जरूरत है। इस फुटकल खाते में पड़े अपने विचारों को बाहर निकालकर, फिर से धो-पोंछकर आवश्यकतानुसार उन्हें उपयोग में लाना है और मन के दमित, दबे-कुचले और दलित विचारों को भी समाज की अगली पंक्ति में जगह देनी है।

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  • Web Title:Mansa vacha Karmana article in Hindustan on 28 august