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भीतर से संघर्ष

पूछकर देखिए- आपका दिन कैसा रहा? पूरी आशंका है कि इसका जवाब होगा-‘बस चल रहा है, बस समय कट रहा है’ या इस जैसा ही कुछ। ये जवाब इतने सामान्य हैं कि हमें नहीं अखरते। इससे जवाब देने वाले के इस नजरिए का ही पता चलता है कि उनके लिए अच्छे समय का मतलब है, हर चीज वैसा हो, जैसा वह चाहते हैं। 

एक चीज हमेशा याद रखनी चाहिए कि बाहरी शक्तियों पर नियंत्रण मुश्किल है। अक्सर उन्हें साधने की कोशिश में हमारी मेहनत का एक बड़ा हिस्सा बेकार चला जाता है। ऐसा नहीं कि उन पर नियंत्रण के लिए हमें संघर्ष नहीं करना चाहिए, लेकिन वह हमेशा हमारी प्राथमिकता न हो, यह ध्यान रखा जाना चाहिए। हमें हमेशा मुख्य संघर्ष बाहरी ताकतों से न करके भीतर के डर, असुरक्षा और अपने स्वभाव से करना चाहिए। यही हमारी बुनियाद हैं। चिंतक माइकल ए सिंगर कहते हैं कि आप दो नहीं होने चाहिए, यानी आपका विकास तभी संभव है, जब भीतर एक ही व्यक्ति रहता हो। ऐसा नहीं हो कि अंदर एक अंश है, जो भयभीत है और एक दूसरा अंश है, जो उस भयभीत को सुरक्षा दे रहा है। आप हमेशा किंतु-परंतु में न फंस निर्णयात्मक रूप से एक हों। इस पार या उस पार। मंझधार में रहना ही संकट पैदा करता है।

महान फुटबॉल खिलाड़ी डियागो माराडोना ने एक खूबसूरत बात कही- मैं हर मैच में विजयी हुआ, क्योंकि मैंने सिर्फ और सिर्फ जीत के लिए खेला। इसीलिए कभी हार के बाद भी मुझे अफसोस नहीं हुआ। नतीजों के प्रति निश्चिंतता को वह एक बड़ी ताकत मानते थे। खेल के दौरान खुद पर उनका जबर्दस्त नियंत्रण होता। हमारा निर्णय भी ऐसा ही होना चाहिए।

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  • Web Title:Mansa vacha Karmana article in Hindustan on 13 September