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जीने की तमन्ना

मनुष्य की जो मूलभूत इच्छाएं हैं, उसे अध्यात्म में एषणा कहा जाता है। एषणा को अंग्रेजी में इ्स्टिटन्क्ट या प्रवृत्ति कहा जा सकता है। ये बहुत बुनियादी शक्तियां हैं, जो इच्छा या भावना से गहरी होती हैं। ऐसी तीन एषणाएं गिनाई जाती हैं, जिनके लिए मनुष्य जीता है: जीवेषणा, लोकेषणा और दारेषणा। अर्थात जीने की इच्छा, प्रसिद्ध होने की इच्छा और काम इच्छा। मनुष्य के हर कृत्य के पीछे ये तीन इच्छाएं हमेशा ही प्रेरक शक्ति की तरह काम करती हैं। ये इतनी गहरी होती हैं कि मनुष्य विवश होकर इनके पीछे भागने लगता है।

इसके अलावा एक और इच्छा है, जो उतनी ही गहरी है, जितनी कि जीने की इच्छा। वह है, मरने की इच्छा। सिग्मंड फ्रायड ने बीसवीं सदी के प्रारंभ में इस प्रवृत्ति की खोज की। उन्होंने उसे नाम दिया थानाटोस। यह ग्रीक भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है मृत्यु का देवता। जीने की इच्छा तो प्रगट और प्रबल होती है, लेकिन अंतर्मन के अंधेरे में मरने की इच्छा भी उतनी ही सशक्त होती है। आखिर जीवन हर व्यक्ति का निजी मामला है। ऊर्जा एक ही है, कभी वह जीने की दिशा में बहती है, तो कभी मरने की दिशा में। 

ओशो का मानना है कि आदमी मरना भी इसीलिए चाहता है, क्योंकि जीने के लिए उसकी जो शर्तें हैं, वे पूरी नहीं होतीं। आत्महत्या अस्तित्व से शिकायत है। वह प्रगाढ़ता से जीना चाहता है, लेकिन उसके सफल न होने से वह विदा हो रहा है। फ्रायड ने भी यह माना है कि जीवन की कशिश अधिक शक्तिशाली होती है। मनुष्य का मन बड़ा बेबूझ है, उसे जीने की तमन्ना होती है, लेकिन मरने का इरादा भी साथ-साथ चलता है। 

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  • Web Title:mansa vacha karmana article in hindustan on 10 september