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आनंद का आकार

हम आनंद देने वाली चीजों को आकार में पहचानते हैं, जबकि आनंद का अस्तित्व ऐसा नहीं है। सौंदर्य महसूस करने की क्षमता, अपने में मगन रहने की ताकत, साधारण वस्तुओं की तारीफ का बोध, लोगों से स्नेह रखना, उन्हें प्यार करना, उदारता के साथ उनसे संबंध बनाना, इन सबके पीछे जो चीज है वह है- संतोष का एहसास। यह एहसास अनाकार ही तो है, और इसलिए अदृश्य है। संतों, दार्शनिकों, कवियों की खोज पर नजर डालें। वे जीवन भर सच्ची खुशी खोजते रहते हैं। वे पाते हैं कि जिसे वे खोज रहे थे, वह देखने में असाधारण और नगण्य सी लगने वाली चीज है। ऐसी, जिसे हम अपने आसपास देखते रहते हैं। यह और बात है कि उसे महसूस नहीं कर पाते। दार्शनिक नीत्शे ने गहन अध्ययन के क्षणों में लिखा- ‘खुशी के लिए छोटी सी चीज ही काफी है। इसके लिए एकदम छोटी सी चीज, एक सांस, पलक का झपकना, एक नजर भर देखना। छोटी सी चीज सबसे अच्छी खुशी है। बस शांत रहना सीखिए।’

छोटी-छोटी चीजें हमारे अंतर्मन को विस्तार देती हैं। छोटी खुशियों के लिए जिस आत्म-सजगता की जरूरत होती है, उसके लिए शांत होना अनिवार्य है। चुप रहने, देखने, सुनने और सजग रहने से आंतरिक खुशी के दरवाजे खुलते हैं। सितारवादक पंडित रविशंकर कहते थे कि जब उनका अंतर्मन शांत था, तभी उन्होंने पत्तों के हिलने की आवाज को पहचाना, महसूस किया कि बादल कितनी लय से सरकते हैं। इसी की बदौलत उन्होंने संगीत के सच्चे रूप को जाना। मन जितना शांत होता है, आनंद उतना ही होता है। यही वह राह है, जहां आप हर चीज की जीवंतता को अपने एहसास में पाएंगे।

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  • Web Title:Mansa vacha Karmana article in Hindustan on 07 September