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मन का पिंजरा

वह हमेशा आरामदायक स्थिति में रहना पसंद करते हैं। ऐसा कर वह खुद को संतुष्ट पाते हैं, पर यह संतुष्टि कितनी वास्तविक है, यह उन्हें पता नहीं चलता। अपने दायरे में खुश रहना एक अलग बात है, दायरे तोड़कर खुश रहने से यह सदैव कमतर होता है। माइकल ए सिंगर अपनी किताब द अनथैटर्ड सोल-द जर्नी बियॉन्ड योरसेल्फ  में कहते हैं- अगर आप अपनी आरामदायक स्थिति से बाहर नहीं जा सकते, तो सही मायने में आप पिंजरे में कैद हैं। यह पिंजरा आपके शरीर को ही नहीं बांधता, आपकी चेतना के विस्तार को सीमित कर देता है। यह अपने को नजरबंद करने जैसा है।

ऐसे लोगों में से ज्यादातर संतुष्टि की बात बढ़-चढ़कर करते हैं, पर सच्चाई यह है कि वे डरपोक हैं। उनके पास अपने विचार हैं, लेकिन एक मॉडल की शक्ल में, जिसमें जरा भी घट-बढ़ उन्हें मंजूर नहीं होती। ई-कॉमर्स कंपनी अलीबाबा के संस्थापक और चीन के सबसे बड़े धनिकों में एक जैक मा ने एक साक्षात्कार में कहा कि अगर आपके पास एक मजबूत पैर और सही सलामत दिमाग है, तो आपको सीमाएं कभी रास नहीं आ सकतीं। आप उन्हें तोड़ते रहेंगे और नए-नए माइल स्टोन बनाते रहेंगे। उनकी बातों को कॉरपोरेट वल्र्ड से जोड़कर ही देखना ठीक नहीं। जरूरी है कि सोच की यात्राएं अनंत की ओर चलती रहें। माइकल ए सिंगर के ही शब्दों में- ‘आध्यात्मिकता का आरंभ तब होता है, जब आप निर्णय लेते हैं कि कोशिश करना बंद नहीं करेंगे। यह अनंत की यात्रा है, जो हर दिन हर पल खुद को आगे बढ़ने पर आधारित है।’ सचमुच ऐसा ही है, इसलिए हर क्षेत्र के धुरंधर एक हद तक आध्यात्मिक जरूर होते हैं।

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  • Web Title:Mansa vacha Karmana article in Hindustan on 06 September