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दिव्य आकर्षण

जैसे राम-कथा में करुणा की प्रधानता है, वैसे ही कृष्ण-कथा में मधुरता की। ये कथाएं मनुष्य को पूर्ण बनाना सिखाती हैं। मानव जीवन को इकहरी दृष्टि से देखा भी नहीं जा सकता। उसमें अनगिनत उतार-चढ़ाव हैं, आती-जाती ऋतुओं के बदलाव हैं। कभी वसंत तो कभी वर्षा, कभी ग्रीष्म तो कभी हेमंत। पूरा जीवन ताप और शीतलता का अद्भुत मिश्रण है।

कृष्ण का अवतरण कृषि-प्रधान सभ्यता का प्रतीक है। वे लीलामय हैं, माखन चोर हैं, वंशीधर हैं, तो चक्रधर भी हैं। वे विश्वासी सखा हैं, तो कूटनीतिज्ञ भी, योगी हैं, तो योद्धा भी। महारास के नायक हैं, तो अपना विश्वरूप दिखाने वाले विराट ईश्वर भी, जिसके लिए कहा गया- कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।  ओशो ने इसलिए कृष्ण को बहुआयामी व्यक्तित्व के रूप में देखा है। राम का चरित्र मर्यादावादी है, कृष्ण लीलामय हैं। मर्यादा में एक निश्चित सीमा में किसी स्वरूप का गठन होता है, पर लीला खेल है, क्रीड़ा है। उसमें जीत-हार का पता नहीं होता। वे प्रेमी हैं, पर कहीं लिप्त नहीं होते। वे परम ज्ञानी हैं, पर अहंकार-शून्य हैं। युद्ध भूमि में खड़े होकर वे गीता  का ज्ञान दे सकते हैं। उनका माधुर्य एक उमड़ते हुए समुद्र की तरह है, जिसमें अन्य सारे रस समाहित हो जाते हैं। वहां अम्ल, तिक्त, कटु, कषाय आदि सारे रस अपनी सत्ता खो देते हैं। बच जाता है, सिर्फ एक दिव्य आकर्षण, जिसे हम कृष्ण कहते हैं। तभी तो मधुराष्टक  में कहा गया है कि कृष्ण के अधर मधुर हैं, हंसना-बोलना-चलना मधुर है। गोपी, यमुना सभी मधुर हैं। कृष्ण मधुर के अधिपति हैं, इसलिए उनका सब कुछ मधुर है- मधुराधिपतेरखिलं मधुरम्।

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  • Web Title:Mansa vacha Karmana article in Hindustan on 04 September