अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

कृष्ण यानी पूर्णावतार

कृष्ण अद्वितीय व्यक्तित्व हैं। उन्हें स्मरण करना, उनकी कथाएं सुनाना आसान है, उन्हें जीना कठिन है। उनके व्यक्तित्व में जितना विरोधाभास है, उतना और किसी महापुरुष में नहीं दिखता। रास रचाना, माखन चुराना, गोपियों को छेड़ना, वह उतनी ही सरलता से करते हैं, जितनी सहजता से युद्ध के बीच रथ को खड़ा कर गीता जैसा गहन गंभीर दर्शन सुनाना। ये दो विपरीत ध्रुव एक ही व्यक्ति में कैसे हो सकते हैं? कृष्ण-जीवन शायद एक महाकाव्य ही हो, लेकिन जिन मनीषियों ने ऐसी इंद्रधनुषी चेतना का आविष्कार किया, वे निश्चय ही बहुआयामी प्रज्ञा पुरुष होंगे।

ओशो कहते हैं कि जो पूर्ण है, वही विराधाभासों को अंगीकार कर सकता है। जीवन दो विपरीत तत्वों से बना है- यहां अंधेरा है और प्रकाश भी; जीवन है और मृत्यु भी; प्रेम है और घृणा भी। इसलिए कृष्ण का वर्णन किया गया है कि वे भीतर योगी और बाहर भोगी दिखाई देते हैं। कृष्ण इस धरती पर फ्रायड से बहुत पहले पैदा हुए,पर वह फ्रायड के बाद के समय के अनुकूल हैं। फ्रायड के साथ एक नई चेतना का जन्म हुआ और वह यह कि दमन गलत है। दमन मनुष्य को आत्म हिंसा में डाल देता है। आदमी अपने से ही लड़ने लगे, तो सिर्फ नष्ट हो सकता है। इतिहास में कृष्ण अकेले हैं, जो दमनवादी नहीं हैं। उन्होंने जीवन के सब रंगों को स्वीकार कर लिए हैं। वह प्रेम से भागते नहीं। वह पुरुष होकर स्त्री से पलायन नहीं करते। वह परमात्मा को अनुभव करते हुए युद्ध से विमुख नहीं होते। वह करुणा से भरे होते हुए भी युद्ध में लड़ने की क्षमता रखते हैं। अहिंसक चित्त है उनका, फिर भी हिंसा के ठेठ दावानल में उतर जाते हैं। 

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:Mansa vacha Karmana article in Hindustan on 03 September