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पुराना छोड़ते चलें

आती-जाती ऋतुएं जीवन-जीने के तरीके का संकेत करती हैं। पेड़-पौधों को मालूम है कि उन्हें कब हरा-भरा होना है और कब पीले पत्ते होकर झर जाना है। ऋतु चक्र हमें हमेशा नए रूप में जीने का संदेश देता है। पंडितों ने कहा है- मधुमास इव द्रुमा: यानी पेड़ों को देखना हो, तो वसंत में देखो। कैसे सूखे काष्ठ में हरियाली का प्रवाह बहता है और पल्लवों की लालिमा बाहर निकल आती है। गीता  के द्वितीय अध्याय में मानव शरीर की मृत्यु को जीर्ण वस्त्र बदलने की तरह बताया गया है। कवि पंत लिखते हैं- द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र।  शास्त्र का आदेश है कि जीवन के अपराह्न काल में मनुष्य वन की ओर प्रयाण करे, वानप्रस्थी हो जाए, सुख-भोग को वैसे ही छोड़ दे, जैसे नाचते हुए मयूर के पंख झरते हैं। जैसे पंख टूटकर गिर जाने पर चिड़िया को कष्ट नहीं होता, वैसे ही सुखों का त्याग मन के भीतर उत्साह का सृजन करे। तुलसी कवितावली  में लिखते हैं, जो फलता है, उसे अंत में झरना पड़ता है, और जो जलता है, उसे कभी-न-कभी बुझना ही पड़ता है।
हमारी ग्रंथों ने हमेशा नए का स्वागत किया है और डंके की चोट पर घोषणा की है कि सिर्फ पुराना होने से ही कोई सार्थक और ग्राह्य नहीं हो जाता। यहां पुराने से मतलब है रूढ़ियां, अंधविश्वास और गतानुगतिकता। नयापन है नया विचार, क्योंकि विचार ही क्रांति है। कवियों की दुनिया भी किसी नएपन का आविष्कार करती है। पुराने के नाम पर सब कुछ नहीं त्यागना है। पुराने बुजुर्ग, पुराने संस्कार, पुरानी सभ्यता के इतिहास की रक्षा भी करनी है, ताकि उनके अनुभवों से हम   निरंतर समृद्ध होते रहें।

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  • Web Title:mansa vacha karmana acticle on hindustan on 9 january