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जग का मुजरा देख

दुनिया वाकई सुंदर है। अगर सुंदर न होती, तो हम भला इसमें क्यों रहते? इसकी सुंदरता की एक विशेषता यह है कि यह लगातार हर पल सुंदर होती रहती है। हमारी पांचों तन्मात्राएं- रूप, रस, गंध, स्पर्श और शब्द, इसमें तृप्ति का अनुभव करती रहती हैं। मूल रूप से तो मनुष्य जन्म से ही प्यासा और अतृप्त जीव होता है। कवि नेपाली कहते हैं, मैं प्यासा भृंग जनम भर का।  तृषित व्यक्ति किसी जलाशय को अमृतकुंड की तरह निहारता है। बड़ी प्यास बड़ी आकांक्षा का रूप लेती है और यह आकांक्षा हमें ईश्वर तक पहुंचाती है।

दुनिया हमारे भीतर छोटी-छोटी इच्छाओं का सृजन करती है। जैसे छोटी नदियां सागर से मिलने के लिए उतावली होती हैं, वैसे ही आनंद को पाने के लिए एक उतावलापन भी चाहिए। हमारे आसपास अणुओं और परमाणुओं का जो नृत्य चल रहा है, हमें उसे देखना है। हमें पेड़ों की पत्तियों का कंपन, फूलों के रंगमय ज्वार में डूबना-उतराना है। धरती की रंगशाला सजी हुई है और आने-जाने वाले पात्रों का अभिनय चल रहा है। इसलिए कबीर रामझरोखे से जग का मुजरा देखना चाहते हैं। देखना द्रष्टाभाव है।

महान विचारक ओशो इसे ‘साक्षीभाव’ कहते हैं। हर वस्तु में एक ध्वनि, संगीत अथवा झंकार है। इसी कारण जड़ वस्तुएं भी जड़ नहीं रह जातीं, और मिट्टी तथा प्रस्तर की मूर्तियां एक जाग्रत सत्ता का रूप ले लेती हैं। उनके संपर्क में आकर हम भी जाग्रत और चैतन्य हो जाते हैं। इसी को महर्षि अरविंद ने ‘चित् पुरुष’ या ‘चैत्य पुरुष’ कहा है। इस विश्व में कुछ भी स्थिर नहीं है। यहां तो ब्रह्म को भी नाचना पड़ता है- लहर-जहर हर नैया नाचे, नैया में खेवैया रे- नेपाली।

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  • Web Title:Hindustan Mansa Wacha Karmna Column on 9th July