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बूंदों के साथ

बारिश की बूंदों का नृत्य देखा है आपने? बारिश होते हुए जरूर देखा होगा, पर नजरें परिष्कृत न करें, तो बारिश का नृत्य दिखाई नहीं देता। मलयालम भाषा के कवि हैं ओएनवी कुरुप। एक कविता में लिखते हैं- तुम्हारे आंगन में/ बूंद-बूंद में/ अपने अनगिनत चांदी के तारों में/ संगीत की सृष्टि कर/ बारिश/ जिप्सी लड़की की तरह नाचती है।  आगे लिखते हैं- तुम नदी पार करती हो/ अचानक बारिश गिरती है/ लहरें चांदी के नुपूर पहन नाचती हैं।  

बूंदों का अपना सौंदर्य है। पूरी धरती इससे प्रेम करती है। स्पेनिश कवि फेदेरिको गार्सिया लोर्का की एक संक्षिप्त कविता है- बादल।  वह लिखते हैं- चाहती हैं पहाड़ियां, निकल आएं उनके पंख, और खोजती हैं वे बादल, सफेद बुर्राक।  बूंदें आषाढ़ की भी होती हैं और सावन की भी। आषाढ़ की बूंदें जब आती हैं, तो लगता है कि वह छिपती-छिपाती आई हों। टोह लेने आई हों कि आखिर तुम लोग तैयार हो कि नहीं। इसके बाद आता है सावन। तब तक मन की माटी पूरी तरह भीग चुकी होती है। नावांकुर अपना सिर उठाकर खड़े हो चुके होते हैं, और फिर पत्ते पर पत्ते। धरती को हरा-भरा करने का पूरा इंतजाम हो चुका होता है। नोबेल पुरस्कार विजेता और पर्यावरणविद् केन्या की वांगारी मथाई कहती थीं कि बूंदों के बरसते ही मुझे लगता था कि अब मेरे लाखों बच्चों को भोजन मिलेगा। वे अपनी मनपसंद चीजें अपनी जड़ों से खींचकर अपनी नसों में उतार सकेंगे। ये लाखों बच्चे उनके द्वारा लगाए गए पौधे थे। बूंदों से शायद ही कोई परेशान होता हो। बूंदों को सहन नहीं, महसूस करने से जोड़ें, तो आप यही पाएंगे कि मन धरती मां की लोरी सुनकर उनींदा हो चुका है। 

 

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  • Web Title:Hindustan Mansa Wacha Karmna Column on 9th August