Hindustan Mansa Wacha Karmna Column on 18th June - टकराहट की राह DA Image

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टकराहट की राह

जब हम समाज में होते हैं, तो वहां संवाद और विवाद चलते रहते हैं। लोग अपने क्रोध, अपनी ईष्र्या और घृणा को लेकर आखिर कहां जाएं? आपसी टकरावों से कभी-कभी युद्ध का वातावरण बन जाता है। यद्ध सिर्फ कुरुक्षेत्र या पानीपत के मैदान में नहीं लडे़ गए, मनुष्य की दुर्दमनीय इच्छाएं जब सामने आईं, तो हमने उन्हें महाभारत जैसा नाम दे दिया। कहते हैं, खगोलीय घटनाओं में हमेशा कुछ न कुछ विस्फोट होते रहते हैं। हमारी मलिन भावनाएं जब हमारे संयम और ज्ञान को अनसुना कर बाहर बड़े वेग से निकल पड़ती हैं, तो हमारा शरीर और मन, दोनों बेकाबू होकर युद्ध में शरीक हो जाते हैं।

रामायण  हो या महाभारत, उनके पात्रों की साधारण बातों, हठ और अहंकार ने मनुष्य-जाति का बड़ा विनाश किया है। लोग कहते हैं कि हमारे इतिहास की रचना में युद्ध और स्त्री का बड़ा हाथ रहा है। हमारे मन में एक अरण्य जीवन-संस्कृति छिपी है, जो अचानक उभरकर हम पर पड़े सभ्यता के नकाब को उतार फेंकती है। तब हमारे शब्द एक हिंसक वन्य-पशु की गुर्राहट में बदल जाते हैं। मनुष्य संस्कृति पर पशु-संस्कृति का यह हमला निरंतर होता रहता है।

हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने निबंध नाखून क्यों बढ़ते हैं  में इसी छिपी हुई पशुवृत्ति का संकेत किया है। मनुष्य बार-बार अपने नाखून काटता है और पशुता से बचने का संकल्प लेता है। जरूरी है कि हम अपने भावों का पैमाना बदलें। क्रोध हो, तो अन्याय के खिलाफ हो, हमारा अहंकार स्वाभिमान बने। गर्व हो, तो देश पर हो, क्योंकि देश भी एक वृहत्तर मानव समाज है। बस इतनी सी बात समझ में आ जाए, तो बंद दरवाजों को खोलने वाली मास्टर चाबी हमारे हाथ लग सकती है।

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  • Web Title:Hindustan Mansa Wacha Karmna Column on 18th June