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झूठ का जाल

झूठ बोलने के कई कारण हैं। ये हमेशा हमें उकसाते रहते हैं। हमें चाहिए कि झूठ न बोलने की जगह सच बोलने का प्रण लें। यह वैसा ही है, जैसा हमें दवाई से बचने की जगह स्वस्थ रहने के बारे में सोचना चाहिए। झूठ के फेर में नफंसना ही सच्चे होने का एकमात्र विकल्प है। नोबेल पुरस्कार विजेता स्वीडिश लेखिका सिग्रिड अनसेट कहती थीं कि झूठ चांद की तरह है। हमेशा से आकर्षक, लेकिन उसकी जमीन हमेशा ही पथरीली रही है। वह अपनी गोद में किसी घास, फूल को पनपने नहीं देती।

वैसे हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि झूठ की मौजूदगी हमेशा हमारे आस-पास होगी। हमारे भीतर भी चाहे-अनचाहे इसके अंश होंगे। बेहतर यह है कि अपने विचारों की पाचन शक्ति बढ़ाएं। दरअसल, ऐसा बहुधा होता है कि हम पहले से सोचते हैं कि आज झूठ नहीं बोलेंगे, पर बोल जाते हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं-डर, गुस्सा, घृणा या फिर यह भी हो सकता है कि कोई कारण ही न हो। पर हम चाहे अपने झूठ को किसी भी मजबूरी का नाम दें, फिर भी हम उस कर्म से अपना पीछा नहीं छुड़ा सकते, जो हमने अपने झूठ से किसी को प्रभावित करके अर्जित किया।

आध्यात्मिक गुरु जग्गी वासुदेव कहते हैं कि झूठ वह चीज है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं। अब जिन चीजों का अस्तित्व है ही नहीं, उनसे लड़ना सबसे मुश्किल काम है। अगर किसी चीज का जाल होता, तो आप उससे जूझकर आगे निकल जाते, पर जो है ही नहीं, उससे आप कैसे जूझेंगे? आप इससे जितना उलझेंगे, यह झूठ उतना ही वास्तविक होता जाएगा। इसलिए बेहतर है कि हमेशा सच के साथ रहा जाए। 

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  • Web Title:Hindustan Mansa Wacha Karmna 14th August