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दूरी प्रेम की कसौटी

अपनी प्रिय वस्तु को अपने समीप रखना और देखना भला कौन पसंद नहीं करता। संसार में पाने का सुख ही तो प्रियता है। पर हमें जो कभी नहीं मिलता, उसके प्रति भी हमारा आकर्षण कम नहीं होता। देवता हमारी पहुंच से दूर हैं, ईश्वर की कोई थाह नहीं मिलती। शास्त्रों ने उसे नेति-नेति  कह दिया है। फिर भी मनुष्य का मन कहां मानता है?

भक्ति शास्त्र ने ईश्वर के अनुभव की चार विधियां विकसित कीं और उसकी समीपता का अनुभव किया। और इसे सामीप्य, सालोक्य, सारूप्य और सायुज्य कहा गया, यानी ईश्वर के हम नजदीक रहें, अपलक उसका सौंदर्य देखें, वह जैसा है, वैसा ही हो जाएं और अंत में हम उसमें पूरी तरह मिल जाएं। ऐसे महाभाव की कल्पना से मनुष्य ने पृथ्वी के वायुमंडल को भेदकर ऊंचाई तक पहुंचना चाहा है। इस उच्चता में ही देवत्व की कल्पना की गई। सांख्यिकी के हिसाब से सूर्य और चंद्रमा भले लाखों, करोड़ों मील दूर हों, लेकिन हमारे ध्यान में सबसे नजदीक होते हैं।

इसलिए प्रेम की कसौटी वियोग ही है। शायद इसीलिए मिलन से अधिक वियोग को महत्व दिया गया है। वियोग के इस भाव ने राम और कृष्ण जैसे अवतारी पुरुषों को बार-बार रुलाया है। अक्षर आंख के बिल्कुल समीप हों, तो पढ़े नहीं जा सकते। कालिदास का यक्ष भी अपनी प्रिया से ‘दूरबंधु’ हो गया है। यह विकलता मनुष्य से ही नहीं, समूची सृष्टि से जोड़ देती है। दूरी को कम करने के लिए ही परमात्मा को माता-पिता, पुत्र या शत्रु के रूप में भी देखा गया। कबीर भी कहते हैं- हरि मेरे पीव, मैं हरि की बहुरिया।  कालिदास ने मन की इस विकलता के लिए किं पुनर्दूरसंस्थे  शब्द का प्रयोग किया है।

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  • Web Title:Hindustan Mansa Wacha Karmna 13th August