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इस निरादर से बचें

जब भी धूप-अगरबत्ती की डिबिया खाली होती है, समझ में नहीं आता कि उसका क्या करूं? कभी त्रिभंगी मुद्रा में बांसुरी बजाते कृष्ण या फिर धनुष-बाण लिए राम मेरा हाथ रोकते हैं। रक्षा बंधन पर बिकती राखियां भी देवी-देवताओं के चित्रों से सजी होती हैं। शाम तक वही राखियां जहां-तहां पड़ी मिलती हैं। दूसरे दिन विराट कूड़े के ढेर का हिस्सा बन जाती हैं।

हमारा देश उत्सवधर्मी है। मिठाई खाना-बांटना सब त्योहारों के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ा है। मिठाई के डिब्बों को आकर्षक बनाने के लिए दुकानदार देवी-देवताओं के चित्र छपवा लेते हैं। कुछ इसलिए भी कि कारोबार पर भगवान की कृपा रहे, खरीदने वालों को लगे कि यह सब उनकी आस्था का ही हिस्सा है। नवरात्र में सिंहवाहिनी दुर्गा, दीपावली पर लक्ष्मी-गणेश, शिवरात्रि पर शिव-पार्वती की आकृतियां हर जगह दिखाई पड़ती हैं। मंदिरों और घरों में जिनकी मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा करके पूरी लगन के साथ साज-संभाल होती है, वे ही विज्ञापन का सामान बनकर उपेक्षित होते हैं।

अपने ही भक्ति भाव को हम नकार देते हैं। सादे और कलात्मक डिब्बों और राखियों को ही वरीयता देंगे, तो कुछ समय में बदलाव आ सकता है। इस तरह हमारे पूजनीय प्रतीकों की प्रतिकृतियां निरादर से बच जाएंगी। ऐसे ही, देवी पर चढ़ाई जाने वाली लाल चुनरियां अक्सर नहरों, नदियों के किनारे कीचड़ में सनी दिखाई पड़ती हैं। चौथाई मीटर लंबी, गोटे लगी छोटी-छोटी चुन्नियां किसी के काम नहीं आतीं। क्यों न छोटे बच्चों की फ्रॉक या सलवार-सूट देवी को अर्पण करके भंडारे के समय गरीब बच्चों को बांट दिए जाएं?

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  • Web Title:Hindustan Mansa Wacha Karmna 12th August