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हमें जो शिक्षा चाहिए

महान से महान ज्ञान और बड़ी से बड़ी संपदा जो किसी मनुष्य के पास हो सकती है, वह भारत को विरासत में मिली है; उसके पास तो वह है, जिसके लिए मानव जाति प्रतीक्षा कर रही है।... ऐसी संपूर्ण आत्मा, जो अतीत के...

हमें जो शिक्षा चाहिए
Monika Minalहिन्दुस्तानWed, 12 Jun 2024 11:17 PM
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महान से महान ज्ञान और बड़ी से बड़ी संपदा जो किसी मनुष्य के पास हो सकती है, वह भारत को विरासत में मिली है; उसके पास तो वह है, जिसके लिए मानव जाति प्रतीक्षा कर रही है।... ऐसी संपूर्ण आत्मा, जो अतीत के उत्तराधिकार से, वर्तमान के विस्तृत होते लाभों से और भविष्य की विशाल संभावनाओं से संपन्न हो, केवल एक राष्ट्रीय शिक्षा की व्यवस्था से ही आ सकती है। वह व्यवस्था वर्तमान विश्वविद्यालयों के तंत्र के किसी विस्तार अथवा नकल से नहीं आ सकती, जिसके सिद्धांत बुनियादी रूप से मिथ्या हैं, प्रणालियां भ्रष्ट और मशीन की तरह हैं। उनकी परंपरा निष्क्रिय और नेमी है, और आत्मा संकीर्ण व दृष्टिहीन। उसे केवल एक नई चेतना और एक ऐसी नई संस्था ही सृजित कर सकती है, जिसका जन्म राष्ट्र के हृदय से हुआ हो और जो पुनरुज्जीवन के प्रकाश और आशा से भरपूर हो।...
नई शिक्षा ऐसी जीवन वृत्तियों को खोल देगी, जो एक साथ ही सम्मान और संपन्नता, प्रतिष्ठा और धन-वैभव के साधन होंगी तथा देश की सेवा के मार्ग भी। क्योंकि जो लोग उसकी संस्थाओं से हर प्रकार से लैस होकर बाहर निकलेंगे, वे ऐसे लोग होंगे, जो देश के आर्थिक जीवन और प्रयास को प्रोत्साहन देंगे। इसके बिना हमारा देश संसार के दबाव में जीवित नहीं रह सकता, अपनी उचित स्थिति प्राप्त करना तो दूर रहा। हमारे व्यक्तिगत स्वार्थ व राष्ट्रीय स्वार्थ एक ही हैं और एक ही दिशा की मांग करते हैं।
व्यक्तिगत रूप से सदैव लीक पीटने के आदी होने के कारण हम सब एक महान और प्रभावकारी मार्ग की अपेक्षा किसी सुरक्षित व नियत किए हुए रास्ते को पसंद करते हैं, उसी पर चलना चाहते हैं, चाहे वह रास्ता हमें कहीं न पहुंचाए और इस तरह स्वयं अपना ही हित नहीं देख पाते, क्योंकि यह प्रवृत्ति अपने को एक नए और अपरीक्षित स्वरूप में प्रस्तुत करती है। मगर यह आत्मा का ओछापन है, जिसे राष्ट्र को उतार फेंकना चाहिए, ताकि उसमें अपनी नियति के लिए साहस प्राप्त हो।...
यह एक ऐसी घड़ी है, जिसमें जैसा भारत के लिए, वैसा ही विश्व के लिए भी, भारत की भावी नियति और आगामी एक सदी के लिए उसके कदमों का मोड़ सशक्त रूप से निर्णीत किया जा रहा है और वह भी किसी साधारण सदी के लिए नहीं, बल्कि एक ऐसी सदी के लिए, जो स्वयं एक महान संधि-काल है और मानव जाति के आंतरिक व बाह्य इतिहास में एक विशद उलट-फेर करने वाला है। आज हम जैसा कर्म करेंगे, वैसा ही हमें अपने कर्म का फल मिलेगा, और ऐसी घड़ी में इस प्रकार की प्रत्येक पुकार हमारे लोगों की आत्मा के लिए एक साथ अवसर भी है, एक पसंद भी और एक परीक्षा भी।
श्री अरविंद 

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