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Hindi News ओपिनियन मनसा वाचा कर्मणाअपने खजाने की रक्षा करें

अपने खजाने की रक्षा करें

लाओत्से चीन के महा-प्रज्ञावान संतों में से एक हैं। उनका दर्शन ताओ बिल्कुल अलग है। वह स्त्रैण ऊर्जा का बहुत सम्मान करते हैं और समर्पण व परम स्वीकार भाव में जीने की सलाह देते हैं। उनके सूत्र हैं...

अपने खजाने की रक्षा करें
Monika Minalहिन्दुस्तानMon, 17 Jun 2024 08:16 PM
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लाओत्से चीन के महा-प्रज्ञावान संतों में से एक हैं। उनका दर्शन ताओ बिल्कुल अलग है। वह स्त्रैण ऊर्जा का बहुत सम्मान करते हैं और समर्पण व परम स्वीकार भाव में जीने की सलाह देते हैं। उनके सूत्र हैं- ‘मेरे तीन खजाने हैं; उन पर पहरा दो और उन्हें सुरक्षित रखो। पहला खजाना है : प्रेम। दूसरा है : अति कभी नहीं और तीसरा है : संसार में प्रथम कभी मत होना। प्रेम के जरिये आदमी अभय को उपलब्ध होता है। अति नहीं करने से आदमी के पास शक्ति का संचय होता है और संसार में प्रथम होने की धृष्टता न करने से आदमी अपनी प्रतिभा का विकास कर सकता है, उसे परिपक्व बना सकता है।’
इसका मर्म तो ओशो ही समझा सकते हैं। प्रेम है दो व्यक्तियों का मिलन; ऐसा क्षण, जब दो व्यक्ति अपने-अपने अहंकार को अलग हटा देते हैं। प्रेम इस भांति की चेष्टा है कि देह तो दो होंगी, लेकिन आत्मा एक होगी। प्रेम खतरनाक सूत्र है, क्योंकि यह आपको विद्रोही बनाता है, इसलिए आप निर्भीक बनते हैं। प्रेम संप्रदाय नहीं जानता; जात-पांत, धर्म सबसे ऊपर उठकर छलांग लेता है, इसलिए लाओत्से कहते हैं कि प्रेम के जरिये आप अभय को उपलब्ध होते हैं।
दूसरा है, अति नहीं करना, अर्थात संतुलन बनाना। मानव मन अपने स्वभाव से अतियों में डोलता रहता है। प्रेम और घृणा, सुख और दुख, सफलता और असफलता के बीच। लेकिन जीवन इन दोनों से बना है, इसलिए आप किसी एक को छोड़ नहीं सकते। दोनों के बीच संतुलन साधना चाहिए, यानी जब सुई मध्य में ठहरती है, तब आप संतुलित होते हैं। संतुलन से आपके व्यक्तित्व में एक ठहराव आता है। अगर अतियों में डोलते रहे, तो चलना बहुत पड़ेगा, मगर पहुंचेंगे नहीं कहीं। 
तीसरा सूत्र आज के माहौल के एकदम उल्टा मालूम होगा। जहां लोग पहला नंबर पाने की दौड़ में उलझे हुए हैं, वहां यह कहना कि अंतिम हो जाओ, भला कौन सुनेगा? अब इसका राज जानिए : अंत में खड़ा होना एक बड़ा राज है, क्योंकि जो अंत में खड़ा है, वह प्रतिस्पद्र्धा के लिए उत्सुक नहीं है; जो अंत में खडे़ होने को राजी है, दुनिया उसे परेशान भी नहीं करती। उसकी कोई टांग नहीं खींचता। वह पहले से ही अंत में खड़ा है, उसे और कहां गिराओगे? हमने बड़ी फजीहत होते देखी है लोगों की, जो प्रथम बैठते हैं। सिंहासन पर जो बैठते हैं, उनकी टांग तो हमेशा कोई न कोई खींच ही रहा है। 
तीसरा खजाना कहता है कि तुम महत्वाकांक्षा छोड़ दो। तुम्हारी एक नियति है, उसे पूरा कर लो। तुम दूसरे के जीवन का अनुकरण क्यों करते हो? एक ही राज है, अपनी नियति पूरी कर लेने का, उस अर्थ को उपलब्ध हो जाने का, जिसके लिए आप जन्मे हो, वह गीत आप गा लो, ताकि वह नृत्य आप में पैदा हो सके।
अमृत साधना 

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