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बिन मांगी सलाह

उनके जाने के बाद वह परेशान हो गए थे। गर्दिश में चल रहे अपने साथी को उन्होंने कुछ समझाने की कोशिश की थी। लेकिन...। ‘जब तक मांगी न जाए, तब तक हमें किसी को सलाह नहीं देनी चाहिए। ज्यादा जोश दिखाने का कोई मतलब नहीं।’ यह कहना है डॉ जेनिफर गटमैन का। वह मशहूर साइकोलॉजिस्ट हैं। उनकी चर्चित किताब है, अ पाथ टु सस्टेनेबल लाइफ सैटिस्फैक्शन।हम अपनी जिंदगी जीते हैं। कभी हम चाहते हैं कि कोई सलाह दे। हमें रास्ता दिखाए। कभी हम बिल्कुल नहीं चाहते कि कोई हमसे कुछ भी कहे। हमें कोई सलाह देता है, तो वह हमें प्रवचन जैसा लगता है। हम ऊबने लगते हैं, उखड़ जाते हैं। हमें अक्सर अनचाही सलाह से दिक्कत होती है। यूं भी हमें सलाह चाहकर ही मांगनी चाहिए। जिस तरह हम अनचाही सलाह पसंद नहीं करते। उसी तरह दूसरों को भी समझना चाहिए।

हर किसी को अपना रास्ता, अपनी मंजिल खुद तय करनी चाहिए। अगर किसी मोड़ पर लगे किसी से मदद लेनी है, तो हमें उसकी कोशिश करनी चाहिए। कभी यह होता है कि हमें किसी की जिंदगी में कुछ कमी नजर आती है। हमारा तजुर्बा हमें सलाह देने को उकसाता है। यही वक्त है, जब हमें अपने को रोकना होता है। हमें पहले यह जान लेना जरूरी है कि कोई हमसे सलाह लेना चाहता है भी या नहीं। हम एक इशारा कर छोड़ सकते हैं। इच्छा हो, तभी सलाह देनी चाहिए। अगर नहीं, तो पीछे हट जाना बेहतर है। हमें किसी किस्म की जबर्दस्ती नहीं करनी चाहिए। ऐसा न हो कि सलाह थोपी हुई लगे। अगर सलाह मांगी जाए, तो पीछे नहीं हटना चाहिए।
 राजीव कटारा

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  • Web Title:hindustan mansa vacha karmana column on 7th September