hindustan mansa vacha karmana column on 19th September - प्रकृति और हम DA Image

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प्रकृति और हम

इस बात को वह दमदार तरीके से कहते हैं कि कुदरत हमें हर अच्छे-बुरे के बारे में साफ-साफ बताती है, लेकिन हम अपनी कमजोर संवेदना की वजह से उस ओर ध्यान नहीं देते। जब तक कुछ खास न घट जाए, तब तक हम उस पर गौर नहीं करते। जिस रास्ते से रोज गुजरते हैं, उस रास्ते में ऐसा खास क्या है, जो हमें देखना-समझना चाहिए, इस बात से भी हम आमतौर पर अनजान बने रहते हैं। कुदरत विविधताओं का खजाना है, लेकिन संवेदनहीनता और लापरवाही की वजह से उस खजाने की ओर हमारा ध्यान शायद ही कभी जाता है। 

जिंदगी की एकरसता हमारी आदत का हिस्सा बनी रहती है। हम अपने आप में इतने ‘मस्त’ रहते हैं कि बाहरी किसी भी कवायद से बेखबर रहते हैं। इससे हमारी कुदरत और समाज के बीच जो भावनाएं होनी चाहिए, वे भी पूरी तरह उभरकर नहीं आ पाती हैं। प्रकृति के चितेरे कवि सुमित्रानंदन पंत ने अपनी कविताओं में प्रकृति के धड़कन को इस कदर एहसास किया कि उसे शब्द और स्वर देकर लोगों को प्रकृति की विविधता और आवाज को सुनने के लिए मजबूर कर दिया। जिस रेत के महीन कण को हम महज नदी के साथ बह आए पत्थर के कण समझते हैं, उन कणों में उन्होंने प्रकृति के गहरे निनाद को शब्दों में पिरोया और उसको प्रकृति का सहचर कहकर संबोधित किया। हम कवि हों या न हों, लेकिन हमारे अंदर कुदरत ने वह क्षमता जरूर दी है कि जो हमें चीजों की प्रकृति को गहराई से समझने की कुव्वत देती है। जिस प्रकृति से हम हवा, पानी, भोजन जैसे असंख्य फायदे लेते हैं, उससे हमारा क्या रिश्ता होना चाहिए, उस पर गौर करें, तो हमारी जिंदगी फिर शायद वैसी नीरस न रहे। 

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  • Web Title:hindustan mansa vacha karmana column on 19th September