hindustan mansa vacha karmana column on 16th September - क्षमा याचना की भावना DA Image

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क्षमा याचना की भावना

वर्षा में जब सब तरफ से बारिश व बादलों से वातावरण घिर जाता है, तो मन स्वभावत: भीतर का रुख करता है। प्रकृति का हरा-भरा उत्सव उसे सरल और शांत बना देता है। वृत्तियां अंतर्मुखी होती हैं और व्यक्ति साल भर के आचरण का लेखा-जोखा करने लगता है। उस रोशनी में उसे अपनी गलतियां दिखाई देती हैं, जिन्हें काम की आपा-धापी में उसने नजरंदाज कर दी थीं। फिर गलत भाव, गलत विचार, सारा कचरा जलाने का मन होता है। इसीलिए जैन धर्म में एक मधुर रिवाज शुरू किया गया, लोग एक-दूसरे को क्षमायाचना भेजते हैं : मैंने आपको जाने-अनजाने दुख दिया हो, तो क्षमा करें। 
यह क्षमा याचना अगर प्रामाणिक हो, पश्चाताप से आई हो, तो बहुत उपयोगी है।

भीतर-बाहर, सब शुद्ध हो जाता है। लेकिन अधिकतर यह औपचारिकता होती है। ऐसी क्षमा याचना का ओशो विरोध करते हैं। उनके शब्दों में सुनें- एक आदमी क्रोध करता है, फिर पश्चाताप करता है। आप आमतौर से सोचते होंगे कि पश्चाताप करने वाला आदमी अच्छा है। लेकिन आदमी सोचता है, क्रोध करके पश्चाताप कर लिया, अच्छा ही हुआ, अब कभी क्रोध न करेंगे। लेकिन सच्चाई यह है कि पश्चाताप से क्रोध बचता है, कटता नहीं। जब आप क्रोध करते हैं, तो आपकी अपनी ही आंखों में जो प्रतिमा है अच्छे आदमी होने की, वह खंडित हो जाती है। मैं इतना सज्जन, और मैंने क्रोध किया। पश्चाताप से प्रतिमा फिर वहीं खड़ी हो जाती है। यह तरकीब है अधिक क्रोध करने की। अब रहने दो क्रोध को वहीं, और उसे देखो, स्वीकार करो। क्रोध संग जीना आसान नहीं है। तभी भीतर से सच्चा भाव उपजेगा।

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  • Web Title:hindustan mansa vacha karmana column on 16th September