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बाजी खत्म होने पर

अपने श्रम, कर्म और भाग्य से तरक्की की सीढ़ियां चढ़ते हुए उन साथियों को याद रखना जरूरी है, जो पिछड़ गए। संपन्नता के दिनों में मनुष्य किसी को अपने सामने टिकने नहीं देता, पर विपन्नता के समय जिनकी उपेक्षा की थी, उनसे नजरें मिलाना तक मुश्किल हो जाता है। इसलिए विनम्रता को अनिवार्य गुण माना गया है। कन्फ्यूशियस इसे सभी सद्गुणों का आधार मानते हैं। विनम्र होने के लिए अहंकार का सर्वथा त्याग जरूरी है। अहं भाव देवताओं को दानव बना देता है और नम्रता मनुष्यों को देवता बनाती है। अहंकार और नम्रता साथ-साथ नहीं चल सकते। अहंकार से मतलब है कर्ता-भाव, यानी जीवन में जितनी उन्नति की, सफलता पाई, उसका श्रेय स्वयं को देना। ‘मैंने किया और फल पाया’ का भाव बाकी सबको तुच्छ समझने की भावना को जन्म देता है। दूसरी ओर, अपनी उपलब्धियों के लिए खुद को शाबाशी देने की बजाय ईश्वर की कृपा का फल मानने से विनीत भाव बना रहता है।

आपसी रिश्तों में नम्रता का भाव गांठ नहीं पड़ने देता। कभी किसी रंजिश की वजह से अगर दो इंसानों में दूरियां आ भी जाती हैं, तो लचीला, नम्र स्वभाव फौरन सुलह करा देता है, नहीं तो जीवन भर के लिए फासले बढ़ते जाते हैं- फिर दुर्गम खाई बन जाते हैं। हम सब एक ही नूर से उपजे हैं, इसलिए राजा-रंक, सफल-असफल मूल रूप से एक हैं। सबकी परिणति एक है। फिर दुर्भाव क्यों? इटली का एक मुहावरा इसी ओर इशारा करता है- शतरंज की बाजी खत्म होने पर बादशाह और प्यादे, सब एक ही डिब्बे में बंद हो जाते हैं। फिर जीवन के खेल में बादशाह क्यों न विनम्र हो और प्यादे को नाचीज क्यों माने?

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  • Web Title:hindustan mansa vacha karmana column on 12th September