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मेरो मेरो सभी कहत हैं

गुरु नानकदेव का यह वाक्य जीवन जीने के सत्य को उजागर करता है। यह मेरा है, यह तेरा है- इसके एक अक्षर में ब्रह्मज्ञान समाया हुआ है। कहते हैं, तेरह या तेरा की गिनती तक आते-आते अनाज तौलते हुए नानकदेव को ईश्वरीय बोध हो गया। वस्तुत: संसार की माया तो सिर्फ भरमाना जानती है। इसमें रहते हुए भी इससे ऊपर हो जाने का भाव हमें ‘सत्’ से जोड़ देता है।
हम दुनिया की चीजों पर अधिकार जमाना चाहते हैं। 

‘यह मेरा है’ यह कहकर हम अपने अहंकार को ही तृप्त करते हैं। दुनिया की यह भेड़चाल है। एक भेड़ अगर गड्ढ़े में गिर जाए, तो सभी भेड़ें बिना सोचे-विचारे उसी का अनुगमन करती हैं। कहा भी गया है, ‘एक पड़ा जेहि गड़ में सबै जाहि वहि बाट’। इसी कारण हम अपनी बुद्धि को ताक पर रखकर देखा-देखी में बुद्धिहीनता कर बैठते हैं। हमारे मन की गति बड़ी तीव्र होती है, इसलिए उसके निर्णय भी अस्थिर और अस्थाई होते हैं। सही विकास धीरे-धीरे ही होता है। किसी बीज का बोना और उसका फसल के रूप में तैयार होना-ये दोनों भिन्न प्रक्रियाएं हैं। इसीलिए हमें विभिन्न ऋतुओं में अलग-अलग तरह के फल-फूल प्राप्त होते हैं। हमारा मन किसी छलावे और किसी भुलावे की तरह हमें लक्ष्य के विपरीत भी ले जा सकता है। कबीर तो यहां तक कह देते हैं कि शरीर तो मरता रहता है। 

जीवन की अवस्थाएं हमारे शरीर को अलग-अलग सांचों में ढालती हैं। इसलिए मन को ही साधने की आवश्यकता है। हमारे मनोमंथन से विष और अमृत, दोनों मिल सकते हैं। इसलिए सावधानी तो चाहिए ही। यह अवधान, यह सावधानी हमें ध्यान, धारणा, समाधि आदि तक ले जाने की सीढ़ी बन सकती है।

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  • Web Title:hindustan mansa vacha karmana column on 10 september