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झूठ के आगे

हममें से ज्यादातर लोग समय-समय पर झूठ बोलते हैं, पर सामाजिक-नैतिक मान्यता के हिसाब से यह गलत समझा जाता है। झूठ को चाहे जान-बूझकर बोला जाए या बिना किसी को नुकसान पहुंचाए, जैसे ही वह पकड़ में आता है, हमारी विश्वसनीयता घट जाती है। हम संदेह के घेरे में आ जाते हैं। वॉट टु डू वेन यू आर कॉट इन अ लाई  के लेखक रॉन करुकी कहते हैं कि सबसे जरूरी है कि आप अपराध-बोध से बाहर निकलें। जिन परिस्थितियों में आपने झूठ बोला था, उन पर विचार करके अगली बार झूठ बोलने के लोभ से खुद को बचा सकते हैं। 

करुकी कहते हैं कि आप अपनी ईमानदारी साबित करने के तरीके खोजिए, एक नहीं कई मिल जाएंगे। जिससे आपने झूठ बोला था, उसके सामने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दें। संभव है, अविश्वनीयता के बादल कुछ छटेंगे। ये बादल पूरी तरह तभी छंट सकते हैं, जब आप अपने आगे के काम से लगातार अपनी बेहतर स्थिति बनाते रहें। झूठ बोलने से जुड़े विश्वसनीयता के संकट से सचिन जैसे दिग्गज खिलाड़ी भी जूझते रहे थे। हरभजन-साइमंड्स विवाद में उन पर झूठी गवाही देने का आरोप लगा था, हालांकि सचिन के झूठ बोलने की बात साबित नहीं हुई। सचिन ने इसके बाद क्या किया? कुछ नहीं। बस वह आरोप-प्रत्यारोप के खेल में नहीं फंसे और अपना काम करते रहे, और इसलिए इस विवाद को छोड़ वह आराम से आगे बढ़ गए। ऐसा बिल क्लिंटन के लिए संभव नहीं हो सका। सोचिए क्यों? रॉन करुकी कहते हैं, क्योंकि न तो वह अपने अपराध बोध से बाहर निकले और न ही झूठ बोलना आगे छोड़ा। खुद पर लगे आरोपों पर उन्होंने भरपूर प्रतिक्रिया दी।

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  • Web Title:hindustan mansa vacha karmana column of 11 september