hindustan mansa vacha karmana column june 28 - अपने गुरु DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

अपने गुरु

गुरुओं के पीछे भागना एक हद तक ही ठीक है। गुरु आपको विकसित कर सकते हैं, पल्लवित-पुष्पित कर सकते हैं, फिर भी वह नहीं दे सकते, जो आप स्वयं खुद को दे सकते हैं। किसी गुरु की राह अपनाने से ज्यादा बेहतर है स्वाध्याय की राह अपनाना। स्वाध्याय का मतलब है स्वयं अध्ययन करना और स्वयं के बताए मार्ग पर आगे बढ़ना। महात्मा बुद्ध ने जब अप्प दीपो भव का संदेश दिया था, तो उनका मतलब यही था कि खुद को अपने ज्ञान की रोशनी से नहलाओ। बुद्ध से पहले भी किसी अज्ञात का दिया संदेश कहता है कि सबसे अच्छा गुरु वह है, जो जीवन भर छात्र बना रहे और सबसे अच्छा छात्र वह है, जो स्वयं अपना गुरु बन जाए। बावजूद अगर किसी को गुरु की तलाश है, तो ध्येय एक ही होना चाहिए कि वह अपना गुरु आप बनने में हमारी मदद करे, न कि अनुयायी बनाकर हमें बांध ले। यहां गुरुओं के भी गुरु रहे दत्तात्रेय पर गौर करें। वह किसी को गुरु बनाने की जगह हमेशा सजग रहकर सीखने पर जोर देते थे। उन्होंने कहा, ‘यह उर्वर पृथ्वी, यह खुला आकाश, बहती हवाएं, जलती आग, बहता पानी, सुबह उठता सूरज, रात बिताता चांद, ये इतराती तितलियां, ये शहद बनाती मधुमक्खियां, ये मदमस्त हाथी, ये व्यस्त चीटियां, ये जाल बुनती मकड़ियां, कुलांचे भरते हिरन, ये चहचहाती चिड़ियां, ये अबोध बच्चे, ये बर्बर शिकारी, ये जहरीले सांप... सब गुरु ही तो हैं।’ दत्तात्रेय की बातें मान लें। स्वाध्याय करें। पर तैत्तिरीयोपनिषद  में उल्लिखित स्वाध्यायान्मा प्रमद: पर गौर करैं। इसका अर्थ है स्वाध्याय में प्रमाद न हो। विनीत रहकर हर अच्छी चीज को ग्रहण करें और बांटें भी।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:hindustan mansa vacha karmana column june 28