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अपने भीतर

प्राय: सभी चिंतक अपने भीतर झांकने की, आत्म-साक्षात्कार करने की बात करते हैं। यह भी कहा गया है कि जो भीतर है, वही बाहर है- यथा पिंडे तथा ब्रह्मांडे। अपने भीतर उतरने का मतलब यह नहीं कि हम बाहर की दुनिया को भुला दें, उसकी अवमानना करें। पथिक  खंड-काव्य में रामनरेश त्रिपाठी इस संसार को ‘दुख का कारखाना’ कहते हैं। सच्चाई तो यही है कि सुख के झीने आवरण में दुख छिपा बैठा है। मानव जीवन की पूरी चौहद्दी ही दुख से घिरी हुई है।

साईं शब्द स्वामी और परमात्मा का वाचक है। सिंधियों के यहां यह आदरसूचक संबोधन के रूप में प्रयुक्त होता है। अवधूतों और साधुओं की परंपरा में भी यह शब्द प्रचलित रहा है। कबीर ने साईं शब्द को गरिमा दी। साईं एक निर्गुण और निराकार की अनुभूति है। वस्तुत: अनुभूति होती ही निराकार है, हम अपनी रुचि और मनोभाव द्वारा उसे एक स्वरूप प्रदान करते हैं। उस ब्रह्म के लिए शास्त्रकारों नेनेति-नेति  कहा है। बुद्धि से उसका हम पार नहीं पा सकते। कस्तूरी मृग के नाभि-अंड में ही सुगंध का भंडार है, पर वह मृग जंगल-जंगल उसे घास में ढूंढ़ता फिरता है।

रसखान ने मन के निकुंज वन में ही उसे ढूंढ़ निकाला है- उस परमात्मा को मैंने कहां-कहां नहीं ढूंढ़ा। पुराणों में, वेद की ऋचाओं में सर्वत्र देखा, पर कुछ पता नहीं चला, पर वह तो कुंज-कुटीर में राधा के चरण तले छिपा बैठा है- देखौ दुरौ वह कुंज कुटीर में बैठो पलोटत राधिका पायन।  निराकार और साकार, दोनों ही रूपों में आत्मानुभूति के रूप में हमारा साईं सतत विद्यमान है, सिर्फ आत्मस्थ होने, अपने भीतर डूबने-उतराने भर की आवश्यकता है, तभी हमारा आत्म-दर्शन पूरा होगा।

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  • Web Title:Hindustan Mansa Vacha Karmana Column June 25