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शांति और अशांति

हम किसको शांति मानें, किसको अशांति? सदा अनुकूल परिस्थिति का निर्माण हो, ऐसा दुनियां में कभी नहीं होता। प्रतिकूल परिस्थितियां भी बनती रहती हैं। स्थायी शांति तो वहां है जहां अनुकूल और प्रतिकूल दोनों प्रकार की स्थिति आने पर भी मनुष्य का मन क्षुब्ध नहीं होता। मनचाहा हुआ तो भी शांति। मनचाहा नहीं हुआ तो भी शांति। यह वृत्ति बनती है तब शांति का अर्थ समझ में आ सकता है। जब तक सुख और दुख में समता और संतुलन का विकास करने की क्षमता विकसित नहीं होती, तब तक व्यक्ति दुख को सुख में बदलने की कला से सुसज्जित नहीं हो सकता। जर्मनी विद्वान फ्रांज काफ्का ने कहा था- उस चीज में बहुत शिद्दत से यकीन करना, जो है नहीं। उस चीज को बनाना है। सिर्फ वही चीजें नहीं बन पाती, जिन्हें हमने शिद्दत से चाहा नहीं।’
 

एक ही परिस्थिति और घटना को दो व्यक्ति भिन्न प्रकार से ग्रहण करते हैं। जिनका चिंतन सकारात्मक होता है, वह दु:ख को सुख, अभाव को भाव, अशांति को शांति और अंधेरों को प्रकाश में बदलने में सफल हो सकता है। जो इस तरह की कला जानते हैं, उन्हीं का जीना सार्थक है, वे ही सच्चे मानव हैं। मोटिवेशनल स्पीकर लिओ बॉबटा कहते हैं, ‘जिंदगी में शांति हालात को ठीक करने से नहीं मिलती, बल्कि यह जान लेने से मिलती है कि आप भीतर से क्या हैं? सुख से प्यार और दु:ख से घृणा की मनोवृत्ति ने ही इंसान को विरोधाभासी जीवन दिया है। जब मन में शांति के फूल खिलते हैं तो कांटों में भी फूलों का दर्शन होता है। जब मन में अशांति के कांटे होते हैं तो फूलों में भी चुभन और पीड़ा का अनुभव होता है।

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  • Web Title:hindustan mansa vacha karmana column July 11