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सरल होना आसान नहीं

हममें से ज्यादातर लोग बहुत सतही तौर पर, अपनी चेतना के बिल्कुल ऊपरी स्तर पर जीते हैं। हम उसी स्तर पर बुद्धिमान व विचारशील बनने का प्रयास करते हैं, धार्मिक बनने का प्रयास करते हैं और अपने मन...

सरल होना आसान नहीं
Monika Minalहिन्दुस्तानTue, 18 Jun 2024 11:44 PM
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हममें से ज्यादातर लोग बहुत सतही तौर पर, अपनी चेतना के बिल्कुल ऊपरी स्तर पर जीते हैं। हम उसी स्तर पर बुद्धिमान व विचारशील बनने का प्रयास करते हैं, धार्मिक बनने का प्रयास करते हैं और अपने मन को जबरदस्ती या अनुशासन से सरल बनाने की कोशिश करते हैं। परंतु यह सरलता नहीं है। जब हम ऊपरी स्तर पर मन को सरल बनने को बाध्य करते हैं, तो ऐसा दबाव उसे कठोर बनाता है, वह मन को लचीला, सूक्ष्मग्राही नहीं बनने देता। 
अपनी चेतना की संपूर्ण, समग्र प्रक्रिया में सरल होना दुष्कर है, क्योंकि वहां कोई आंतरिक गोपनीयता संभव ही नहीं; वहां स्वयं की प्रक्रिया के अन्वेषण, उसकी खोज की उत्सुकता अनिवार्य है, और इसका अर्थ है कि हम प्रत्येक सूचना, प्रत्येक संकेत के प्रति जागरूक हों; इसका अर्थ है कि हम अपनी आशंकाओं, अपनी आशाओं के प्रति सचेत हों, उनका अन्वेषण करें तथा उनसे मुक्त होते चले जाएं। जब मन व हृदय वास्तव में सरल होते हैं, उन पर परतें नहीं जमी होतीं, सिर्फ तभी हम अपने सामने खड़ी तमाम समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। 
ज्ञान हमारी समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। आप पुनर्जन्म, मृत्यु के बाद अस्तित्व के बारे में हो सकता है कि जानते हों या आपका उस सिद्धांत पर भरोसा हो। पर इससे समस्या हल नहीं होती। आपके किसी सिद्धांत से, किसी जानकारी से, किसी विश्वास से, मृत्यु की समस्या को दरकिनार नहीं किया जा सकता। वह कहीं अधिक रहस्यमय, अधिक गहन और अधिक सर्जनात्मक है। इन सभी चीजों पर नए सिरे से अन्वेषण करने की क्षमता हमारे भीतर होनी चाहिए, क्योंकि प्रत्यक्ष अनुभव से ही समस्याएं हल हो सकती हैं और प्रत्यक्ष अनुभव के लिए सरलता जरूरी है। इसका अर्थ है, संवेदनशीलता का होना। ज्ञान का बोझ मन को मंद बना देता है। अतीत द्वारा, भविष्य द्वारा मन को मंद बना दिया जाता है। हमारे ऊपर अपने परिवेश के निरंतर पड़ने वाले शक्तिशाली प्रभावों व दबावों का सामना करने की क्षमता उसी मन में होती है, जो क्षण-प्रतिक्षण, सतत रूप से वर्तमान के साथ सहज सामंजस्य की क्षमता रखता है।
इस प्रकार, धार्मिक व्यक्ति वास्तव में वह नहीं है, जो चोगा या लंगोट पहनता है, जो दिन में एक बार भोजन करता है, जिसने विधि-निषेध के अनगिनत व्रत ले रखे हैं। धार्मिक व्यक्ति वह है, जो अपने अंतर में सरल है, जो कुछ बनने की फिराक में नहीं है। ऐसे मन में असाधारण ग्रहणशीलता होती है, क्योंकि वहां कोई अवरोध नहीं होता, कोई भय नहीं होता, उसे किसी लक्ष्य की ओर बढ़ना नहीं है। अत: ऐसा मन अनुकंपा को, ईश्वर को, सत्य को अथवा जो भी नाम आप दें, उसे ग्रहण करने में सक्षम होता है। वह मन जो ढूंढ़ रहा है, टटोल रहा है, विक्षुब्ध है, वह सरल नहीं है। 
जे कृष्णमूर्ति 

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