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बुद्ध-श्रोण संवाद 

राजा श्रोण बुद्ध के पास जब दीक्षित होने पहुंचा, तब राजधानी भरोसा न कर सकी। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि श्रोण भिक्षु बन जाएगा। यहां तक कि बुद्ध के शिष्य भी आंखें फाड़े रह गए! क्योंकि श्रोण की...

बुद्ध-श्रोण संवाद 
Monika Minalहिन्दुस्तानTue, 14 May 2024 11:16 PM
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राजा श्रोण बुद्ध के पास जब दीक्षित होने पहुंचा, तब राजधानी भरोसा न कर सकी। किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि श्रोण भिक्षु बन जाएगा। यहां तक कि बुद्ध के शिष्य भी आंखें फाड़े रह गए! क्योंकि श्रोण की ख्याति एक भोगी की थी। उसके राजमहल में उस जमाने की सबसे सुंदर ्त्रिरयां थीं, दुनिया के कोने-कोने की श्रेष्ठतम मदिरा उपलब्ध होती और रात भर राग-रंग चलता था। उसके मन में कभी संन्यास की भी कल्पना उठेगी, यह सोचा भी नहीं था किसी ने। 
भिक्षुओं ने बुद्ध से पूछा, हमें भरोसा नहीं आता कि श्रोण संन्यस्त हो रहा है? बुद्ध ने कहा, मैं जानता था कि यह संन्यस्त होगा। सच पूछो, तो मैं इसी के लिए आज राजधानी आया था, क्योंकि जो एक अति पर जाता है, वह दूसरी अति पर भी जाएगा। भोग की एक अति है, इसने पूरी कर डाली; वहां अब और आगे रास्ता नहीं है, तो अहंकार की तृप्ति का उपाय भी नहीं है। जब अहंकार के आगे दीवार आ गई, तो आगे अहंकार कहां जाए? 
बुद्ध ने भिक्षुओं से कहा, तुम सब थोडे़ दिन प्रतीक्षा करो, मैं जो कह रहा हूं, उसका सत्य तुम लोग स्वयं अनुभव करोगे और लोगों ने देखा, दूसरे भिक्षु तो समतल रास्ते पर चलते थे, लेकिन श्रोण कांटों और झाड़ियों के बीच से गुजरता। उसके पैर लहूलुहान हो जाते। धूप होती तो अन्य भिक्षु वृक्षों की छाया में बैठते, श्रोण धूप में ही खड़ा रहता। दूसरे भिक्षु तो दिन में एक बार भोजन करते, श्रोण दो दिन में एक बार भोजन करता। एक समय आया, जब श्रोण ने भोजन-पानी लेना भी बंद कर दिया। ऐसा लगा कि अब वह दो-चार दिनों का मेहमान है, तब बुद्ध उसके पास गए। बुद्ध ने उससे कहा- श्रोण, मैंने सुना है कि जब तू सम्राट था, तब तुझे वीणा बजाने की बड़ी आतुरता रहती थी। बताओ, जब वीणा के तार बहुत ढीले हों, तो संगीत पैदा होता है या नहीं?
श्रोण ने जवाब दिया- भंते, तार ढीले होंगे, तो संगीत कैसे पैदा होगा? टंकार ही पैदा नहीं हो सकती। बुद्ध ने फिर पूछा- और अगर तार बहुत कसे हों, तो संगीत पैदा होता है या नहीं? श्रोण ने कहा : बहुत कसे हों, तब तो छूते ही तार टूट जाएंगे, संगीत कहां पैदा होगा?
तब बुद्ध ने कहा- श्रोण, मैं तुम्हें याद दिलाने आया हूं। जैसे, तुझे वीणा का अनुभव है, वैसे ही मुझे जीवन-वीणा का अनुभव है। इसलिए अब तू जाग, बहुत हो गया। मैं प्रतीक्षा करता रहा कि तुझे कर लेने दूं अति। पहले तेरे तार बहुत ढीले थे, अब तूने बहुत कस लिए हैं। अब समय आ गया है कि तू मध्य में आ जा। श्रोण की आंखों से आंसू बहने लगे। उसे बोध हुआ, उसे बुद्ध की बात समझ में आ गई थी!
ओशो 

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