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अड़ तो नहीं रहे

कुछ देर तो समझाते रहे बॉस, फिर उखड़कर बोले, ‘तुम कुछ समझना क्यों नहीं चाहते? आखिर इतने अड़ियल क्यों हो?’ ‘अड़ियल होने का मतलब है कि हम अपनी सोच विकसित नहीं कर पाते। और यही सबसे बड़ी दिक्कत है।’ यह मानना है डॉ ऐ्ड्रिरया मैथ्यूज का। वह मशहूर साइकोथिरेपिस्ट हैं। बेहतरीन मोटीवेशनल स्पीकर हैं। उनकी बेहद चर्चित किताब है, रिस्टोरिंग  माई सोल : अ वर्कबुक फॉर फाइंडिंग ऐंड लिविंग द ऑथेन्टिक सेल्फ।

अक्सर हम एक बात मान लेते हैं। और उस बात को इतने जोरदार ढंग से मान बैठते हैं कि उसके आगे सोचने को तैयार नहीं होते। हम कहीं अटक जाते हैं। अड़ जाते हैं। कोई अपनी बात करता है। हमें कुछ समझाने की कोशिश करता है। लेकिन हम तो एक इंच भी हिलने को तैयार नहीं होते। हम ही सही हैं। यह अपने आप में अच्छी सोच नहीं है। दूसरे भी सही हो सकते हैं। उनकी बात में वजन हो सकता है। हम जब अड़ जाते हैं, तो सिक्के के दूसरे पहलू को नहीं देख पाते।

एक तो हम हर चीज देख नहीं सकते। दूसरे, जितनी दिख जाती है, उसी पर अड़ जाते हैं। न जाने सच के कितने आयाम होते हैं। हम एक पर अटक जाएंगे, तो सच बदल नहीं जाएगा। हां, हम सच को जानने का अपना दरवाजा बंद कर लेंगे। अगर हम अपना दरवाजा बंद कर लेंगे, तो नुकसान किसी और का नहीं करेंगे। अड़ जाना हमारे भीतर के किसी डर को ही दिखाता है। हम खुलने से डरते हैं। और बंद होकर सुरक्षित महसूस करते हैं। हमें आगे बढ़ने के लिए अपने डर को निकालना ही होता है। खुले बगैर हम अपनी दुनिया को खोल नहीं सकते।

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  • Web Title:Hindustan Mansa Vacha Karmana Column August 10