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ओशो से क्या डरना

स्वामी विवेकानंद ने एक संस्मरण लिखा है कि जब पहली-पहली बार धर्म-यात्रा पर उत्सुक हुआ, तो मेरे घर का जो रास्ता था, वह वेश्याओं के मोहल्ले से होकर गुजरता था; संन्यासी होने के कारण मैं मील, दो मील...

ओशो से क्या डरना
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानSun, 03 Dec 2023 10:23 PM
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स्वामी विवेकानंद ने एक संस्मरण लिखा है कि जब पहली-पहली बार धर्म-यात्रा पर उत्सुक हुआ, तो मेरे घर का जो रास्ता था, वह वेश्याओं के मोहल्ले से होकर गुजरता था; संन्यासी होने के कारण मैं मील, दो मील का लंबा चक्कर लगाकर उस मोहल्ले से बचकर घर पहुंचता था। तब सोचता था कि यह मेरे संन्यास का ही रूप है। मगर बाद में यही पता चला कि यह उस वेश्याओं के मोहल्ले का आकर्षण ही था, जो विपरीत हो गया था, अन्यथा उससे बचकर जाने की भी कोई जरूरत नहीं है। 
बाद में विवेकानंद जयपुर की एक छोटी-सी रियासत में मेहमान बनकर गए। जिस दिन वह वहां से विदा हो रहे थे, उस दिन राजा ने एक स्वागत-समारोह का आयोजन किया, जिसमें उसने बनारस की एक तवायफ बुला ली। ऐन समय पर विवेकानंद को पता चला, तो उन्होंने जाने से इनकार कर दिया। तवायफ बहुत दुखी हुई। उसने एक भजन गाया, जिस भजन में उसने कहा कि एक लोहे का टुकड़ा पूजा के घर में भी होता है, और कसाई के द्वार पर भी पड़ा होता है। दोनों ही लोहे के टुकड़े हैं, लेकिन पारस की खूबी यही है कि वह दोनों को ही सोना कर दे। अगर पारस यह कहे कि मंदिर में जो टुकड़ा है, उसको ही सोना कर सकता हूं और कसाई के घर के लोहे को सोना नहीं कर सकता, तो वह पारस नकली है। 
विवेकानंद के प्राण कांप गए। पारस पत्थर की तो खूबी ही यही है कि तवायफ को भी स्पर्श करे, तो सोना हो जाए। विवेकानंद भागकर पहुंच गए उस जगह, जहां वह तवायफ गीत गा रही थी। उसकी आंखों से आंसू झर रहे थे। विवेकानंद ने उसे देखा और उन्होंने लिखा कि पहली बार ऐसा हुआ कि उनके भीतर न कोई आकर्षण था और न कोई विकर्षण। 
विकर्षण भी हो, तो वह आकर्षण का ही रूप है। वेश्या से बचना पड़े, तो यह उसका आकर्षण ही है, जो कहीं अचेतन मन के किसी कोने में छिपा हुआ है, और जिसका डर है। वेश्याओं से कोई नहीं डरता, अपने भीतर छिपे हुए उनके आकर्षण से डरता है। हाल ही में मैं एक शहर में ओशो ध्यान शिविर के लिए गई थी। वहां कुछ पत्रकार आए थे, वे पूछ रहे थे, ओशो से डर क्यों लगता है? मैंने उनसे कहा, यह तो मैं पहली बार सुन रही हूं। ओशो का आकर्षण पूरी दुनिया में है। जितने ओशो पढ़े-सुने जाते हैं, उतना शायद ही कोई हो। हां, डर उनके सत्य से लगता होगा। दरअसल, वह निर्भीकता से हमारी कुंठाओं और बेईमानियों को उघाड़ते हैं, सच का आईना दिखा देते हैं, जिसे हम देखना नहीं चाहते। ओशो से क्या डरना! डर तो उस असत्य से लगना चाहिए, जो हमारे भीतर मौजूद है।
अमृत साधना  

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