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सरल होना

कहा जाता है कि हम जैसे-जैसे बाहर की दुनिया का सामना करते हैं, अपनी सरलता खोते जाते हैं। इस पर ईरानी फिल्मकार माजिद मजीदी की एक फिल्म है- द सांग ऑफ स्पैरो।  उन्होंने इस फिल्म में दिखाया है कि जब हम अपने घर और गांव से बाहर निकलते हैं, तो किस तरह अपनी सरलता खोते जाते हैं। फिल्म के मुख्य पात्र करीम को जब इसके खोने का एहसास होता है, तो वह फिर से इसे पाने की जद्दोजहद में जुट जाता है। ऐसा नहीं कि घर से निकलना जटिल हो जाना है, लेकिन तब सरलता को बचाने का अतिरिक्त प्रयास करना पड़ता है। हमें बस इसका प्रयास करना पड़ता है कि हम जटिल न हों, सरलता तो हमारे साथ है ही। यहां रूमी का सवाल याद करें- तुम मन की जेल में क्यों रहते हो, जबकि दरवाजा तो पूरी तरह खुला है? वह प्रकृति से सीखने की ताकीद करते हैं, जहां बडे़ से बड़ा बदलाव भी इतनी सरलता से हो जाता है, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। नदियां सरलता से बहती रहती हैं, फूलों को खिलने में कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं करता होता और न ही बादल राजा को बरसने में।  


हमें भ्रम रहता है कि लीक से हटकर चलना है, तो जटिल चीजों को अपनाना होगा। हम यह भूल जाते हैं कि कबीर अपने सरल-सहज दोहे और तुलसीदास अपनी सीधी-सादी गाथा रामचरितमानस  से जितने लोकप्रिय हुए, शायद ही कोई दूसरा हुआ। आइंस्टीन के सिद्धांत आम लोगों के लिए विज्ञान के जटिलतम सिद्धांत समझे जाते हैं, पर आइंस्टीन का कहना था, ‘यदि तुम अपनी बात छह साल के बच्चे को समझा नहीं सकते, तो इसका मतलब है कि तुमने खुद उसे समझा नहीं है।’

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  • Web Title:Hindustan Mansa Vacha Karmana Column 30 May