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दुख का मूल अहंकार

तुम मेरे पास आते हो और पूछते हो कि दुख कैसे मिटे? तुम बिना अहंकार को छोड़े ही दुखों को छोड़ना चाहते हो। मगर यह संभव नहीं है और यदि मैं कहता हूं, ‘अपना अहंकार छोड़ो’, तो मैं तुम्हारी आंखों में हमेशा...

दुख का मूल अहंकार
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Pankaj Tomarहिन्दुस्तानTue, 25 Jun 2024 08:53 PM
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तुम मेरे पास आते हो और पूछते हो कि दुख कैसे मिटे? तुम बिना अहंकार को छोड़े ही दुखों को छोड़ना चाहते हो। मगर यह संभव नहीं है और यदि मैं कहता हूं, ‘अपना अहंकार छोड़ो’, तो मैं तुम्हारी आंखों में हमेशा देखता हूं कि जैसे तुम यह सोच रहे हो कि मैं विषय बदल रहा हूं। तुम सोचते हो कि तुम तो यह पूछने आए हो, दुखों से किस तरह छुटकारा पाया जाए और मैं किसी अन्य चीज के बारे में बात कर रहा हूं। मैं कह रहा हूं, ‘अहंकार को छोड़ो।’ वास्तव में, यह लगता ऐसा ही है, जैसे मानो यह कोई अन्य चीज है।
मुल्ला नसरुद्दीन चांदनी रात में एक सुंदर स्त्री के साथ बैठा हुआ था और महान चीजों के बारे में बात कर रहा था। बात करते हुए वह बहुत अधिक रोमांटिक होता जा रहा था। लेकिन स्त्री बहुत अधिक यथार्थ की जमीन से जुड़ी हुई और व्यावहारिक थी। जब मुल्ला वास्तव में प्रेम की ऊंची पेंगें भरने लगा, तो उस स्त्री ने उससे पूछा- ‘मुल्ला! तुम्हारा प्यार करना तो ठीक है, पर क्या तुम मुझसे विवाह करोगे?’ मुल्ला ने जवाब दिया, ‘सुनो! विषय को बदलो मत!’
मैंने कई बार तुम्हारी आंखों में यही चीज देखी है। तुम एक समस्या लेकर आते हो और मैं किसी अन्य चीज के बारे में बात करना शुरू कर देता हूं। यह कुछ दूसरी चीज केवल परिधि पर दिखाई देती है, मैंने देखा कि असली कारण ही वही है। तुम दुखों को तो छोड़ना चाहते हो, लेकिन अहंकार को नहीं छोड़ना चाहते और दुख छोड़े नहीं जा सकते। दुख तो अहंकार की छाया हैं। केवल अहंकार ही गिराया जा सकता है।
याद रखो, अहंकार के गिरते ही दुख स्वत: मिट जाते हैं। उसकी कीमत चुकाना बहुत अधिक लगता है। तुम कहते हो, ‘मैं इस पर विचार करूंगा।’ तुम्हारी दुखों को छोड़ने में वास्तव में कोई रुचि है ही नहीं। यदि वास्तव में तुम्हारी दिलचस्पी है, तो केवल इस तथ्य को समझ लेने भर से तुम तुरंत अहंकार को 
छोड़ दोगे। 
सिग्मंड फ्रायड ने कहा है, मनुष्य का स्वभाव ही दुखी रहने का है। मैं इस पर विश्वास नहीं करता, लेकिन लगभग निन्यानबे प्रतिशत लोगों के बारे में वह ठीक कहता है। मैं इससे इनकार नहीं कर सकता। फ्रायड अनुभव करता है कि इस बारे में मनुष्य के लिए कोई भी आशा नहीं है, बुनियादी रूप से मनुष्य दुखी है। उसके दुखों का रूपांतरण नहीं किया जा सकता। वह प्रसन्न और सुखी नहीं बनाया जा सकता। मनुष्य असंभव की मांग करता है। वह अहंकारी भी बने रहना चाहता है और साथ ही साथ प्रसन्न भी। यह ऐसा ही है कि खिली धूप भी चाहिए और चांदनी रात की शीतलता भी।
ओशो 

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