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3 दिसंबर, 2020|6:28|IST

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अभय होना

अभय होना जिंदगी का एक अनिवार्य तत्व है, पर हम इससे दूर हैं। इसे हम जीवन-मूल्य की तरह नहीं लेते, नतीजतन डर-डरकर जीते हैं और जीते हुए भी जीवन से दूर हो जाते हैं। 
सुकरात के जीवन से हमें एक सीख जरूर लेनी चाहिए। उन्हें सजा के तौर पर विष का प्याला पीने के लिए देने के वक्त उनके समीप आस्तिक और नास्तिक, दोनों तरह के मित्र मौजूद थे। पहले उनके नास्तिक मित्रों ने पूछा, क्या आपको मौत का भय नहीं है? सुकरात ने मुस्कराते हुए कहा, ‘इस समय मैं आप लोगों के ही मत के अनुसार निर्भय हूं। आप सब कहते हैं कि आत्मा का अस्तित्व ही नहीं है, तो फिर चिंता का विषय है ही नहीं। शरीर नश्वर है। इसे एक न एक दिन नष्ट होना ही है, तो चिंता का प्रश्न ही नहीं उठता।’ 
यह सुनकर उनके आस्तिक मित्रों ने भी वही सवाल किया। सुकरात ने उन्हें कहा, ‘आप लोगों के अनुसार, आत्मा अमर है। विषपान के बाद यदि मर मैं गया, तब भी मेरी आत्मा तो मरेगी नहीं, फिर डर किस बात का?’
आम जीवन में होता यह है कि हम हर कदम पर अपने भय को पालते रहते हैं और उसी के अनुसार अपने कदम बढ़ाते हैं। राजा राममोहन राय जब सती-प्रथा पर रोक के लिए संघर्षरत थे, तब उन्होंने कई हमले झेले। उन्होंने कहा कि ये हमले मुझे झुका नहीं पाएंगे। मैं निर्भय हूं इनके आगे, क्योंकि मैं जानता हूं कि इनके लिए ही लड़ रहा हूं। दरअसल, जब आप व्यापक हित की लड़ाई लड़ रहे होते हैं, तब आपकी बुनियाद अपने आप मजबूत हो जाती है। फिर अगर सत्य-निष्ठा आपके साथ हो, तो आप खुद-ब-खुद अभयता प्राप्त कर लेते हैं।  
 

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  • Web Title:hindustan mansa vacha karmana column 26 august 2020