DA Image

मनसा वाचा कर्मणाअपनी-अपनी पसंद

 महेंद्र मधुकरPublished By: Manish Mishra
Mon, 24 May 2021 10:56 PM
अपनी-अपनी पसंद

दुनिया में सबकी अपनी-अपनी रुचि, अपनी पसंद होती है। मोटे तौर पर पसंद का संबंध हमारी इंद्रियों से होता है। पसंद से हमारी पहचान बनती है। अनेक रंगों की वस्तु में से जब किसी एक पर उंगली रखनी होती है, तब कभी-कभी हमें तत्काल निर्णय लेना पड़ता है। उस पसंद के पीछे कोई तर्क या कारण नहीं होता। मुख्यत: वहां आंखों के पैमाने से ही काम लिया जाता है। इससे यह भी पता चलता है कि हमारा मन क्या चाहता है! पुराने लोगों ने इसे ‘भिन्न रुचिर्हिलोक’ कहा है। इसी पसंद के विकास से भाषा, व्यवहार, रहन-सहन और संस्कृति का निर्माण होता है। हमारी पसंद मुख्य रूप से सौंदर्य-बोध पर टिकी होती है। हमारी आंखें रंगों का ताना-बाना रचती हैं, जीभ स्वाद ढूंढ़ती है, कान मधुर स्वर और संगीत सुनना चाहते हैं, तो हाथों को मुलायम स्पर्श भाता है और नासिका को इत्र की सुगंध सुहाती है। आश्चर्य यह है कि मन को समझना कई बार बहुत कठिन हो जाता है। जैसे एक रंग में दूसरा रंग मिलकर तीसरे रंग में बदल जाता है, लगभग वैसी ही ‘सिन्थेसिस’ की प्रक्रिया हमारे अचेतन में काम करती रहती है। यह भी सच है कि केवल सुंदर सुडौल रूप और आकृति पर ही हम नहीं रीझते, कभी-कभी भीतर की कला और गुण भी हमें अपनी ओर खींचते हैं। इसीलिए कला की दुनिया में कुछ भी व्यर्थ नहीं होता। इसलिए ‘एब्सट्रैक्ट’ चित्रों के सभी पारखी नहीं होते। कहीं एक चित्र-प्रदर्शनी लगी थी। एक महिला एक चित्र को देखकर रुक गई। चित्रकार पास आकर बोला- मेरे चित्र का शीर्षक है ‘मन की उलझन’। महिला ने चौंकते हुए कहा- ‘ओह! मैंने समझा अलग किस्म की जलेबी है।’
 

संबंधित खबरें