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इच्छा एक बड़ी समस्या

हममें से अधिकांश लोगों के लिए इच्छा एक बड़ी समस्या है- संपत्ति की, पद की, शक्ति की, सुविधा की, अमरता की, सातत्य की, प्रेम पाने की इच्छा; किसी ऐसी चीज को हासिल करने की इच्छा, जो स्थायी, संतोषजनक...

इच्छा एक बड़ी समस्या
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानMon, 24 Jun 2024 10:52 PM
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हममें से अधिकांश लोगों के लिए इच्छा एक बड़ी समस्या है- संपत्ति की, पद की, शक्ति की, सुविधा की, अमरता की, सातत्य की, प्रेम पाने की इच्छा; किसी ऐसी चीज को हासिल करने की इच्छा, जो स्थायी, संतोषजनक, कालातीत हो। अब यह इच्छा है क्या? यह क्या है, जिससे हम प्रेरित होते हैं या बाध्य होते हैं। मेरा मतलब यह नहीं कि जो कुछ हमारे पास है या जो भी हम हैं, उससे हमें संतुष्ट हो जाना चाहिए। यह तो मात्र उसका विपरीत हुआ, जो हम चाहते हैं। हम यह जानने का प्रयत्न कर रहे हैं कि इच्छा क्या है और यदि हम खुलेपन के साथ इसकी तह में जा सकें, तो मैं समझता हूं कि हम एक मौलिक परिवर्तन ला सकेंगे। 
सामान्यत: परिवर्तन से हमारा यही मतलब होता है कि किसी एक इच्छित वस्तु से असंतुष्ट होने पर उसकी जगह हम कुछ और खोज लेते हैं। हम एक इच्छित वस्तु से निरंतर दूसरे की ओर डोलने लगते हैं, जिसको हम अधिक ऊंची, अधिक महान या अधिक परिष्कृत समझते हैं। मगर इच्छा कितनी ही परिष्कृत क्यों न हो, फिर भी वह इच्छा ही है और इच्छा की इस गति में एक अंतहीन संघर्ष, विपरीतों का द्वंद्व बना रहता है।
क्या इच्छा के स्वरूप और उसमें परिवर्तन की संभावना का पता लगाना जरूरी नहीं है? क्या बिना किसी प्रतीक और उसके संवेदन के इच्छा हो सकती है? जाहिर है, ऐसा नहीं होता। यह प्रतीक कोई चित्र हो सकता है या कोई व्यक्ति, शब्द, रूप, नाम या विचार हो सकता है, जो मुझे एक संवेदन देता है। यदि यह संवेदन सुखद है, तो मैं उसके प्रतीक को प्राप्त करना चाहता हूं, उसे अपने अधिकार में लेना चाहता हूं और उसे पकडे़ रहना चाहता हूं। मैं चाहता हूं कि मेरा यह सुख बना रहे। समय-समय पर भावना के अनुसार मैं उस चित्र, छवि, विषय को बदलता रहता हूं। इस प्रकार पुराने का मैं प्रतिरोध करता हूं और उस नए के सामने आत्मसमर्पण करता हूं, जिसे मैं अधिक ऊंचा, अधिक महान, अधिक संतोषप्रद रामझता हूं। इस प्रकार इच्छा में प्रतिरोध और समर्पण होता है, जिसमें प्रलोभन समाया रहता है। 
यदि मैं अपने भीतर इच्छा की समस्त प्रक्रिया का निरीक्षण करूं, तो देख पाऊंगा कि यहां सदा कोई न कोई लक्ष्य है, जिसकी ओर मेरा मन और अधिक संवेदन पाने के लिए लालायित है। यहां प्रतीक, शब्द और वस्तु ही यह केंद्र है, जिसके चारों ओर सभी कामनाएं, प्रयत्न, महत्वाकांक्षाएं निर्मित हुआ करती हैं। जितना अधिक मैं कुंठित होता हूं, उतना ही अधिक ‘मैं’ को शक्ति देता हूं। तो जब तक आशा है, उत्कंठा है, भय की पृष्ठभूमि बनी ही रहती है और यह उसी केंद्र को दृढ़ करती रहती है, जबकि क्रांति सिर्फ केंद्र पर ही संभव है, न कि सतह पर, क्योंकि सतही बदलाव मन का भटकाव भर है। 
    जे कृष्णमूर्ति 

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