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ईश्वर को कैसे पाएं

एक सज्जन ने मुझसे सवाल किया है कि ईश्वर को पाने का सरलतम मार्ग कौन सा है? मुझे लगता है कि कोई सरल मार्ग नहीं है, क्योंकि ईश्वर को पाना अत्यंत कठिन, अत्यधिक श्रमसाध्य बात है। जिसे हम ईश्वर कहते...

ईश्वर को कैसे पाएं
Pankaj Tomarहिन्दुस्तानTue, 21 Nov 2023 10:36 PM
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एक सज्जन ने मुझसे सवाल किया है कि ईश्वर को पाने का सरलतम मार्ग कौन सा है? मुझे लगता है कि कोई सरल मार्ग नहीं है, क्योंकि ईश्वर को पाना अत्यंत कठिन, अत्यधिक श्रमसाध्य बात है। जिसे हम ईश्वर कहते हैं; क्या मन ही ने उसका निर्माण नहीं किया है? आप जानते ही हैं, मन क्या होता है? मन समय का परिणाम है और यह कुछ भी, किसी भी भ्रांति को निर्मित कर सकता है। तरह-तरह की धारणाएं बुनने तथा कल्पनाओं के प्रक्षेपण की अद्भुत शक्ति इसके पास है।
मन निरंतर संचय, काट-छांट और चयन करता रहता है। संकीर्ण, सीमित तथा पूर्वाग्रहों से ग्रसित होने के कारण यह अपनी सीमाओं के अनुसार ईश्वर की कल्पना कर सकता है, उसकी छवि बना सकता है। चूंकि कुछ खास शिक्षकों, पुरोहितों तथा तथाकथित उद्धारकर्ताओं ने कह रखा है कि ईश्वर है, और उसका वर्णन भी कर दिया है, इसलिए उसी शब्दावली में मन ईश्वर की कल्पना तो कर सकता है; लेकिन वह कल्पना, वह छवि ईश्वर नहीं है। ईश्वर का अन्वेषण मन द्वारा नहीं किया जा सकता।
ईश्वर को समझने के लिए पहले आपको अपने मन को समझना होगा, जो आसान नहीं, बल्कि बहुत कठिन काम है। मानव मन बहुत पेचीदा है, इसको समझना सरल नहीं है। बैठे-बैठे किसी प्रकार के सपने में खो जाना, तरह-तरह के दिव्य दर्शनों तथा भ्रांतियों में लीन हो जाना और यह सोचने लगना कि आप ईश्वर के बहुत करीब आ गए हैं, यह सब तो काफी सरल है। मन अपने साथ अतिशय छल कर सकता है। अत: जिसको ईश्वर कहा जा सकता है, उसका अनुभव करने के लिए आपको पूर्णत: शांत होना होगा; और क्या आपको यह मालूम नहीं कि यह कितना अधिक कठिन है? 
क्या आपने कभी यह गौर किया है कि वयस्क लोग कभी भी शांत नहीं बैठ पाते हैं। वे किस तरह बेचैन रहते हैं, प्राय: अपने पैरों की उंगलियां हिलाते मिलेंगे या फिर हाथ डुलाते हुए दिखेंगे? जब शारीरिक रूप से ही निश्चल बैठ पाना इतना दु:साध्य है, तो मन का निश्चल होना कितना ज्यादा कठिन होगा, आप समझ ही सकते हैं! 
आप किसी गुरु का अनुगमन कर सकते हैं और अपने मन को शांत होने के लिए बाध्य कर सकते हैं, लेकिन वास्तव में आपका मन शांत नहीं होता, बल्कि यह तब भी बेचैन होता है, जैसे किसी बच्चे को कोने में खड़ा कर दिया गया हो। बिना किसी जोर-जबरदस्ती के पूर्णत: मौन होना, मन की एक महान कला है। केवल तभी उसकी अनुभूति हो पाने की संभावना होती है, जिसे ईश्वर कहा जा सकता है। जब तक आपके और उसके बीच इतने अवरोध हैं, तब तक आप परम तत्व के दर्शन कैसे कर सकते हैं?
जे कृष्णमूर्ति  

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