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आइल गवनवा की बारी

कबीर इतने लोकप्रिय क्यों हैं? दरअसल, उनकी परंपरा कहने-सुनने की परंपरा रही है, मौखिक परंपरा रही है। वह पूर्णत: लोक के लिए कह रहे थे, लोक से लेकर कह रहे थे और लोक में रहते हुए कह रहे थे। यह अकस्मात...

आइल गवनवा की बारी
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Pankaj Tomarहिन्दुस्तानFri, 21 Jun 2024 09:20 PM
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कबीर इतने लोकप्रिय क्यों हैं? दरअसल, उनकी परंपरा कहने-सुनने की परंपरा रही है, मौखिक परंपरा रही है। वह पूर्णत: लोक के लिए कह रहे थे, लोक से लेकर कह रहे थे और लोक में रहते हुए कह रहे थे। यह अकस्मात नहीं है कि कबीर की बानियों में लोक के अनगिनत शब्द उनके अर्थ और अनुभव समाए हुए हैं, बल्कि लोक के अनुभव और लोक की प्रसिद्धियों को माने बिना साहित्य और दर्शनशास्त्र का परमार्थ नहीं सधता। कुम्हार और जुलाहे के हस्त कौशल व लौकिक अनुभवों के कई उदाहरण दर्शन शास्त्र के गं्रथों में मिल जाते हैं। कबीर ने दर्शन के शास्त्रीय संदर्भों को लोक जीवन और लोक भाषा से जोड़ा।
लोक का संबंध मनुष्य की सनातन संवेदना और आस्थाओं से जुड़ा है। लोक को साधारण सी भी ठेस पूरे समाज को झनझनाहट और उद्वेलन से भर देती है। इस लोक-शक्ति के आधार पर ही भारतीय संस्कृति पूरे विश्व या ब्रह्मांड को एक मानवीय रिश्ते में गूंथ देती है। इस अद्भुत लोक को लेकर चलते हैं कबीर। उनका धर्म और कर्म साथ-साथ चलता है। करघे पर ताना-बाना बुनते हुए ज्ञान की ऐसी चादर बुनते हैं, जो काल के किसी भी स्पर्श से मैली नहीं होती। मृत्यु की ओर से जीवन को देखने वाले कबीर विवाह के रूपक में भी मौत का मुखौटा लगाते हैं और ‘आइल गवनवा की बारी’ के बहाने जीवन की संध्या बेला, उसकी क्षणभंगुरता की ओर इंगित करते हैं। 
कबीर की भाषा को समझने के लिए गांव-गली, खेत-खलिहान, नट-बाजीगर, मल्लाहों, जुलाहों, कामगरों की घरेलू व जातीय-प्रजातीय भाषा की संपदा का संग्रह अपेक्षित है। इसके बिना कबीर के शब्द  अपरिभाषित और अविश्लेषित रह जाएंगे।
नीरजा माधव  

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